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जैन धर्म परिचय

पांचवें आरे की तीस पहचान

1.नगर, ग्राम जितने छोटे—छोटे होंगे ।

2.ग्राम श्मशान की बस्ती जितने होंगे ।

3.कुटुम्ब में कलह, ईर्ष्या बहुत होगी ।

4.राजा यम जैसे निर्दय होंगे ।

5.प्रधान कर्मचारी लंचा—रिश्‍वत विशेष लेंगे ।

6.सेवक, स्वामी का द्रोही होगा ।

7. सास—सर्पिणी समान, वधू—डाइन समान होगी ।

8.कई कुलीन स्त्रियां निर्लज्ज होंगी ।

9.पुत्र और शिष्य स्वेच्छाचारी होंगे ।

10.मेह कम आयेंगे, बाढ़ विशेष ।

11.दुर्जन धन—सुख तथा सम्मान पाएंगे ।

12.सज्जन अल्प—ऋद्धि तथा अल्प मान पाएंगे ।

13.परराष्‍ट्र, रोग, मृत्यु तथा दुर्भिक्ष का भय अधिक होगा ।

14.चोर, मूर्ख तथा कुन्थु जीव विशेष होंगे ।

15.ब्राह्मण, धन लोभी तथा होम ज्यादा करेंगे ।

16.शिष्य गुरुकुल—वास त्यागी होंगे, विनयी शिष्य कम होंगे ।

17.मंद धर्म—कषाय वासित होंगे, गन्दे पानी जैसे अशुद्ध होंगे ।

18.अल्प बलशाली सम्यक्त्वी होंगे ।

19.महा—शक्तिशाली मिथ्यात्वी होंगे ।

20.देव दर्शन दुर्लभ होंगे ।

21.विद्या, मन्त्र तथा औषधि का प्रभाव कम होगा ।

22.गोरस, मधुरस तथा गन्ध द्रव्यों में कमी होगी ।

23.बल, धन—धान्य तथा आयुष्य अल्प—स्थायी होंगे ।

24.साधु—श्रावक की उत्कृष्‍ट पडिमा व्यवच्छिन्‍न हो जाएगी ।

25.गुरु शिष्य को सम्यक् प्रकार से सूत्र नहीं पढ़ाएंगे ।

26.शिष्य कलह और असमाधि—हेतु होंगे ।

27.आराधक साधु कम और मूढ़ विशेष होंगे ।

28.आचार्य अपनी गतिविधि को अधिक महत्त्व देंगे । यति तन्त्र—मन्त्र के उद्यमी होंगे, जमीन के लिए झगड़ा करेंगे, कुटुम्बियों की तरह व्यवहार करेंगे तथा भले साधुओं से भिड़ जाएंगे, इत्यादि ।

29.म्लेच्छ राजा बलवान होंगे ।

30.हिन्दू राजाओं में बल कम होगा ।