पर्युषण महापर्व संवत्सरी
संवत्सरी—एक संवत्सर यानि एक वर्ष के बाद आने वाले महानतम दिन को व्यवहार से ‘संवत्सरी’ कह दिया गया है ।
वस्तुतः इस पर्व का नाम है—‘पर्युषण’ । भगवान महावीर ने चतुर्मास के 50 दिन बीतने पर और 70 दिन बाकी रहने पर पर्युषण पर्व का आराधन किया, ऐसा समवायांग में उल्लेख है । तिथियों की घट—बढ़ के कारण कभी—कभी इधर 49 दिन और उधर 71 दिन हो जाते हैं ।
पर्युषण का अर्थ—परि—उपसर्ग, वस् धातु और अन् प्रत्यय—इन तीनों के संयोग से पर्युषण शब्द निष्पन्न हुआ है । परि—समन्तात् समग्रतया उषणं वसनं निवास करणं अर्थात् सम्पूर्ण रूप से निवास करना । विभाव से हटकर स्वभाव में रमण करना । शास्त्रों में यह पर्व एक ही दिन का स्वीकृत हुआ है, सात दिन तो पर्व की सम्यक् आराधना की तैयारी के लिए पूर्वाचार्यों के द्वारा नियत किये गये हैं, अतः वे भी उपेक्षणीय नहीं हैं । जैसे बलवान पर धावा बोलने के लिए बल का संचय करना आवश्यक है, उसी प्रकार रागादि शत्रुओं की घात के लिए सात दिन आध्यात्मिक बल संग्रह के समझने चाहिए । यह पर्व मात्र जैन संस्कृति का ही नहीं, मानव संस्कृति का पर्व है ।