मुख्य सामग्री पर जाएँ
जैन धर्म परिचय

तीर्थंकरों के नामकरण का इतिहास

बालक जब उत्पन्‍न होता है तब वह अनाम होता है । जन्म के कुछ दिनों बाद उसका नामकरण होता है । नामकरण का हेतु है—पहचान । कभी—कभी नामकरण के पीछे कोई घटना विशेष भी जुड़ जाती है । कभी—कभी शारीरिक वर्ण, चिह्न, स्वप्‍न, दोहद आदि के आधार पर भी बालक का नामकरण कर दिया जाता है । इस अवसर्पिणी काल में जैन—धर्म में ऋषभ आदि चौबीस तीर्थंकर हुए हैं । उनके नामकरण के पीछे भी कोई न कोई हेतु रहा है ।

1. ऋषभ प्रभु—भगवान ऋषभ की माता मरूदेवा ने पहला स्वप्‍न ‘वृषभ’ का देखा था । भगवान ऋषभ की दोनों जांघों पर ‘वृषभ’ का चिह्न था, अतः उनका नाम वृषभ रखा गया । ऋषभ और वृषभ दोनों एकार्थक हैं । ।

2. अजित प्रभु—भगवान अजित के माता—पिता द्यूत—क्रीड़ा करते थे । उसमें उनके पिता की ही विजय होती थी । जब से अजित गर्भ में आये तब से उनकी माता द्यूत—क्रीड़ा में विजित होने लगी, अतः उन्होंने अपने पुत्र का नाम अजित रखा ।

3. संभव प्रभु—जब भगवान संभव गर्भ में आये तब अधिक धान्य उत्पन्‍न हुआ, अतः उनका नाम संभव रखा गया ।

4. अभिनन्दन प्रभु—भगवान अभिनन्दन जब गर्भ में आये तब से इन्द्र उन्हें बार—बार वन्दन करने लगा, अतः उनका नाम अभिनन्दन रखा गया ।

5. सुमति प्रभु—भगवान सुमति जब गर्भ में आये तब से उनकी माता में निर्णायक बुद्धि उत्पन्‍न हुई, अतः उनका नाम सुमति रखा गया ।

6. पद्‍मप्रभु—भगवान पद्‍मप्रभु जब गर्भ में आये तब उनकी माता को कमल की शय्या पर सोने का दोहद हुआ । किसी देव ने कमल की शय्या का निर्माण कर उसका दोहद पूर्ण किया । भगवान का वर्ण भी पद्‍म जैसा था, अतः उनका नाम पद्‍मप्रभु रखा गया ।

7. सुपार्श्‍व प्रभु—भगवान सुपार्श्‍व जब गर्भ में आये तब उनकी माता के दोनों पार्श्‍व (काख के नीचे वाला भाग) सुन्दर हो गये, अतः उनका नाम सुपार्श्‍व रखा ।

8. चन्द्रप्रभु—भगवान चन्द्रप्रभु जब गर्भ में आये थे तब उनकी माता को चन्द्र का दोहद हुआ एवं उनका वर्ण भी चन्द्रमा जैसा था, अतः उनका नाम चन्द्रप्रभु रखा गया ।

9. सुविधि प्रभु—भगवान सुविधि जब गर्भ में आए तब उनकी माता सभी कार्यों में कुशलता प्राप्त करने लगी, अतः उनका नाम सुविधि रखा गया ।

10. शीतल प्रभु—भगवान शीतल के पिता पित्त—दाह से पीड़ित थे । औषधोपचार से भी वह शान्त नहीं हुआ । जब से भगवान शीतल माता के गर्भ में आए तब से उनका पित्त—दाह रोग शान्त हो गया, अतः उनका नाम शीतल रखा गया ।

11. श्रेयांस प्रभु—भगवान श्रेयांस के पिता के पास परम्परागत एक देव—परिगृहीत शय्या थी । उसकी पूजा की जाती थी । जो उस पर बैठता, देवता उसे कष्‍ट देता । जब भगवान श्रेयांस गर्भ में आए तब उनकी माता को उस शय्या पर बैठने का दोहद हुआ । वह उस पर बैठ गयी । तीर्थंकर को गर्भस्थ जानकर देव ने उसे कष्‍ट नहीं दिया । इस प्रकार गर्भ के प्रभाव से माता की सुरक्षा हुई, अतः उसने अपने पुत्र का नाम श्रेयांस रखा ।

12. वासुपूज्य प्रभु—भगवान वासुपूज्य जब गर्भ में आये तब इन्द्र बार—बार उनकी माता की पूजा करने लगा, अतः उनका नाम वासुपूज्य रखा गया एवं वासुपूज्य के गर्भ में आने पर वैश्रमण देव रत्‍नों से राजकुल को भरने लगे, अतः उनका नाम वासुपूज्य रखा गया ।

13. विमल प्रभु—भगवान विमल के गर्भ में आने पर उनकी माता का शरीर तथा बुद्धि निर्मल हो गयी, अतः उनका नाम ‘विमल’ रखा गया ।

14. अनन्त प्रभु—भगवान अनन्त जब गर्भ में आये तब उनकी माता ने अति विशाल रत्‍न जटित माला को स्वप्‍न में देखा था, अतः उनका नाम अनन्त रखा गया ।

15. धर्म प्रभु—भगवान धर्म जब गर्भ में आए तब उनकी माता विशेष रूप से धर्म—परायण हुई, अतः उनका नाम धर्म रखा गया ।

16. शान्ति प्रभु—भगवान शान्ति जब गर्भ में आए तब एक उपद्रव शांत हुआ था, अतः उनका नाम शान्ति रखा गया ।

17. कुन्थु प्रभु—भगवान कुन्थु जब गर्भ में आये तब उनकी माता सुन्दर और उन्‍नत विशाल भू—भाग पर रत्‍नमय स्तूप को स्वप्‍न में देखकर जागृत हुई, अतः उनका नाम कुन्थु रखा गया ।

18. अर प्रभु—भगवान अर जब गर्भ में आये तब उनकी माता ने स्वप्‍न में एक सुन्दर और विशाल अर (चक्र) को देखा, अतः उनका नाम अर रखा गया ।

19. मल्लि प्रभु—भगवान मल्लि जब गर्भ में आये तब उनकी माता को सब ऋतुओं के सुगन्धित फूलों की माला से बनी शय्या पर सोने का दोहद हुआ, अतः उनका नाम मल्लि रखा गया ।

20. मुनिसुव्रत प्रभु—भगवान मुनिसुव्रत जब गर्भ में आए तब उनकी माता सुव्रत (व्रत परायण) हुई, अतः उनका नाम सुव्रत रखा गया ।

21. नमि प्रभु—भगवान नमि जब गर्भ में आए तब शत्रु राजाओं ने उनके नगर पर आक्रमण कर दिया । गर्भ के प्रभाव से उनकी माता के मन में महल की अट्टालिका (छत) पर जाने की इच्छा हुई । वे छत पर गयी और उन्हें देखकर गर्भ के प्रभाव से शत्रु राजा नत हो गये, अतः उनका नाम नमि रखा गया ।

22. अरिष्‍टनेमि प्रभु—भगवान अरिष्‍टनेमि जब गर्भ में आए तब उनकी माता ने स्वप्‍न में एक अरि रत्‍नमय नेमि (चक्र) उछलता हुआ देखा, अतः उनका नाम अरिष्‍टनेमि रखा गया ।

23. पार्श्‍व प्रभु—भगवान पार्श्‍व जब गर्भ में आये तब स्वप्‍न में उनकी माता ने गर्भ के प्रभाव से घोर अन्धकार में भी एक बार सात सिर वाले सर्प को शय्या के पास से जाते हुए देखा । उसने शय्या से बाहर निकली हुई राजा की भुजा को शय्या पर लाते हुए कहा यह सर्प जा रहा है । राजा ने पूछा—तुमने कैसे जाना ? उसने कहा—मैं देख रही हूं । राजा ने दीपक के प्रकाश से देखा तो सर्प ही दिखाई दिया । राजा ने सोचा—इस घोर अंधकार में भी इसने गर्भ के अतिशय प्रभाव से ही सर्प को देखा है, अतः उन्होंने अपने पुत्र का नाम पार्श्‍व रखा ।

24. वर्धमान प्रभु—भगवान वर्धमान जब गर्भ में आये तब से ज्ञात कुल में विशेष रूप से धन की वृद्धि हुई, अतः उनका नाम वर्धमान रखा गया ।