नमस्कार महामंत्र साधना
नमस्कार महामंत्र जैन परम्परा का विशिष्ट मंत्र है । इस मंगल—मंत्र द्वारा लाखों नहीं, करोड़ों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं । यह मंगल भावनाओं से भरा मंत्र जगत में मांगल्य की वृद्धि करता है । मांगल्य की भावनाओं को बढ़ाता है । इस मंत्र के पीछे अनन्त साधकों की साधना है, अतः इसकी नियमित साधना से साधक के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं ।
णमो अरहंताणं
(मैं अरहन्तों को नमस्कार करता हूं ।)
जिन्होंने राग—द्वेष रूपी कर्म शत्रु का नाश करके केवलज्ञान (ब्रह्मज्ञान) प्राप्त कर लिया है, वे तीर्थंकर भगवान अरहन्त कहलाते हैं ।
णमो सिद्धाणं
(मैं सिद्धों को नमस्कार करता हूं)
जो अष्ट कर्मों को सर्वथा क्षय करके निज—आत्मरूप में अवस्थित हो गए हैं, जन्म—मरण की श्रृंखला को तोड़कर सिद्धि, मोक्ष, निर्वाण प्राप्त कर चुके हैं, वे सिद्ध कहलाते हैं ।
णमो आयरियाणं
(मैं धर्माचार्यों को नमस्कार करता हूं ।)
ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप और वीर्य—इन पांच प्रकार के आचारों का जो स्वयं विशेष जागरूकता से पालन करते हैं और अपने शिष्यों से पालन करवाते हैं, वे आचार्य कहलाते हैं ।
णमो उवज्झायाणं
(मैं उपाध्यायों को नमस्कार करता हूं ।)
विशेषतः धर्म शास्त्रों के अध्ययन—अध्यापन कार्य को सम्पादित करने वाले उपाध्याय कहलाते हैं ।
णमो लोए सव्वसाहूणं
(मैं लोक के सब (शुद्ध) साधुओं को नमस्कार करता हूं ।)
जो मुनि पंच महाव्रत पालक, अठारह सहस्र गुण धारक तथा परमोपकारक हैं—वे मुनि साधु कहलाते हैं ।
नमस्कार के पांच पद, अक्षर हैं पैंतीस ।
ग्यारह लघु, चौबीस गुरु, दीर्घ पनर, हस बीस ।।
बारह आठ छत्तीस पच्चीसा, साधु सत्ताईस गुणवाला ।
एक सौ ने आठ गुणां री, आ गावो गुण माला ।।
इस तरह कुल 108 मनकों की माला का जप किया जाता है । 108 गुण पांच पदों की वन्दना में अलग—अलग बताये गये हैं ।
एसो पंच णमुक्कारो, सव्वपावपणासणो ।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं ।
यह नमस्कार महामंत्र सब पापों का नाश करने वाला और सब मंगलों में प्रथम मंगल है ।
मंत्र साधना में अरुचि प्रतीत हो तो समझना चाहिए—
अभी मेरी वृत्तियां इसके लिए तैयार नहीं हैं । जैसे रुचि के बिना किया गया आहार रसोत्पत्ति का कारण न बनकर रोगोत्पत्ति का कारण बनता है ।
‘उसने जप किया और फल मिल गया, मुझे क्यों नहीं मिला ?’ ऐसा सोचना अव्यावहारिक है । आप अपना हृदय टटोलें, दूसरों से तोलें नहीं ।
रंग, केन्द्र और श्वासोच्छ्वास के साथ
महामंत्र जपने की विधि
णमो अरहंताणं— ज्योतिर्मय श्वेत रंग में अरिहंतों का ध्यान
णमो सिद्धाणं— ज्योतिर्मय अरुण रंग में सिद्धों का ध्यान
णमो आयरियाणं— ज्योतिर्मय पीले रंग में आचार्यों का ध्यान
णमो उवज्झायाणं— ज्योतिर्मय हरे रंग में उपाध्यायों का ध्यान
णमो लोए सव्वसाहूणं— ज्योतिर्मय नीले रंग में साधुओं का ध्यान
केन्द्रस्थान
णमो अरहंताणं—ज्ञान—केन्द्रमस्तक के मध्य भाग पर
णमो सिद्धाणं—दर्शन—केन्द्रभृकुटि के मध्य भाग पर
णमो आयरियाणं—विशुद्धि—केन्द्रकण्ठ के भाग पर
णमो उवज्झायाणं—आनन्द—केन्द्रहृदय के भाग पर
णमो लोए सव्वसाहूणं—शक्ति—केन्द्ररीढ़ के अन्तिम भाग पर
श्वासोच्छ्वास विधि
णमो अरहंताणं— श्वास ग्रहण करते हुए
णमो सिद्धाणं— श्वास छोड़ते हुए
णमो आयरियाणं— श्वास ग्रहण करते हुए
णमो उवज्झायाणं— श्वास छोड़ते हुए
णमो लोए— श्वास ग्रहण करते हुए
सव्वसाहूणं— श्वास छोड़ते हुए
नोट : यदि श्वास इतना लम्बा न हो सके तो एक पद को दो भागों में बांट लें । जैसे श्वास ग्रहण करते हुए णमो और छोड़ते हुए श्वास में अरहंताणं अथवा श्वास को हृदय—चक्र पर रोक कर यथा—शक्ति महामंत्र का जप करें ।