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मंगल साधना

आचार्य वन्दना विधि

परम आचारकुशल, धर्मोपदेशक, धर्मधुरंधर, बहुश्रुत, मेधावी, सत्यनिष्‍ठ, श्रद्धा—धृति—शक्ति—शान्ति सम्पन्‍न, अष्‍ट गणी—सम्पदा से सुशोभित, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के ज्ञाता, चतुर्विध धर्मसंघ के शास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि एवं छत्तीस गुणों के धारक, वर्तमान आचार्यश्री महाश्रमणजी आदि धर्माचार्यों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक वन्दना—‘तिक्खुत्तो आयाहिणं....(तिक्खुत्तो का पाठ बोलें) ।