मन के दस दोष
1.अविवेक—सामायिक करते समय किसी प्रकार का विवेक न रखना ।
2.यश—कीर्ति—यश प्राप्त होगा, आदर बढ़ेगा, लोग धर्मात्मा कहेंगे, मेरी प्रशंसा करेंगे- इस भावना से सामायिक करना ।
3.लाभार्थ—धन आदि के लाभ की इच्छा से सामायिक करना ।
4.गर्व—मैं बहुत सामायिक करने वाला हूँ, मेरे बराबर कौन सामायिक कर सकता है या मैं बड़ा कुलीन हूं, आदि गर्व करना ।
5.भय—ऊंचे घराने का व्यक्ति होकर भी यदि सामायिक न करूं तो लोग क्या कहेंगे, अथवा किसी अपराध के कारण मिलने वाले राजदण्ड से एवं देनदारी आदि से बचने के लिए सामायिक ले बैठना ।
6.निदान—सामायिक का कोई भौतिक फल चाहना, जैसे अमुक पदार्थ या संसारी सुख के लिए सामायिक का फल बेच डालना ।
7.संशय—सामायिक करते—करते इतने दिन हो गये, फिर भी कुछ नहीं मिला इत्यादि सामायिक के फल के सम्बन्ध में संशय करना ।
8.रोष—सामायिक में क्रोध, मान, माया, लोभ करना । लड़—झगड़ कर या रूठकर सामायिक करना ।
9.अविनय—सामायिक के प्रति आदर भाव न रखना ।
10.अबहुमान—बिना श्रद्धा अनादरपूर्वक या दबाव से सामायिक करना ।