पंचपद वन्दना (प्राचीन)
प्रथम पद—पहले पदे श्री सीमंधरजी स्वामी आदि जघन्य बीस तीर्थंकर देवाधिदेव उत्कृष्ट एक सौ साठ तीर्थंकर देवाधिदेव पंच महाविदेह क्षेत्र में विचरते हैं—अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त चारित्र, अनन्त बल, अशोक वृक्ष, पुष्पवृष्टि, दिव्य ध्वनि, देवदुन्दुभि, स्फटिक सिंहासन, भामण्डल, छत्र, चामर—इन द्वादश गुणों के धारक, एक हजार आठ शुभ लक्षण युक्त शरीर, चौंसठ इन्द्रों के पूजनीय, चौंतीस अतिशय, पैंतीस वचनातिशय से सुशोभित इस प्रकार के श्री अरिहंत भगवान के प्रति हाथ जोड़, मान मोड़ ‘तिक्खुत्तो आयाहिणं....
द्वितीय पद—दूसरे पदे अनन्त सिद्ध पन्द्रह प्रकार के अनन्त चौबीस अष्टकर्मों को क्षय करके मोक्ष पहुंचे—केवल ज्ञान, केवल दर्शन, आत्मिक सुख, क्षायिक सम्यक्त्व, अटल अवगाहना, अमूर्तित्व, अगुरुलघुत्व, अन्तराय रहित—इन अष्टगुण संयुक्त, जन्म—मरण, जरा, रोग, शोक, दुःख दारिद्रय रहित सर्वदा शाश्वत सुखपूर्वक विराजमान है—ऐसे श्री सिद्ध भगवान के प्रति हाथ जोड़, मान मोड़ ‘तिक्खुत्तो आयाहिणं....
तृतीय पद—तीसरे पदे गुरु पूज्य श्री 1008 श्री श्री महाश्रमणजी आदि, वे आचार्य भगवान कैसे हैं—पंचमहाव्रत पालने वाले, चार कषाय को टालने वाले, पंच आचार को पालने वाले, पंच समिति और तीन गुप्ति से युक्त, पांच इन्द्रियों को जीतने वाले, नव बाड़ सहित ब्रह्मचर्य व्रत को पालने वाले इन छत्तीस गुणों के धारक, शासन—शृंगार, गच्छाधार, धर्म धुरन्धर, सकल शुभंकर, भुवन भास्कर, मिथ्यात्व नाशक, तीर्थंकर देववत् धर्मोद्योत्कारी ऐसे महापुरुष आचार्यश्री के प्रति हाथ जोड़, मान मोड़ ‘तिक्खुत्तो आयाहिणं....
चतुर्थ पद—चौथे पदे उपाध्यायजी महाराज वे कैसे हैं ग्यारह अंग और बारह उपांगों का स्वयं अध्ययन करते हैं और दूसरों को अध्ययन करवाते हैं ऐसे पच्चीस गुणों के धारक श्री उपाध्यायजी महाराज के प्रति हाथ जोड़, मान मोड़ ‘तिक्खुत्तो आयाहिणं....
पंचम पद—पांचवें पदे जघन्य (कम से कम) दो हजार क्रोड़ से अधिक साधु—साध्वी उत्कृष्ट (अधिक से अधिक) नव हजार क्रोड़ साधु—साध्वी अढ़ाई द्वीप पन्द्रह क्षेत्रों में विहार करते हैं, वे महामुनिराज कैसे हैं—पंच महाव्रत के पालनहार, पांच इन्द्रियों के जीतनहार, चार कषाय के टालनहार, भाव सत्य, करण सत्य, योग सत्य, क्षमावन्त, वैराग्यवन्त, मन समाधारणता, वचन समाधारणता, काय समाधारणता, ज्ञान सम्पन्न, दर्शन सम्पन्न, चारित्र सम्पन्न वेदना या मृत्यु आने से उसे समभावपूर्वक सहन करने वाले इन सत्ताईस गुणों के धारक, बाईस परीषहों को जीतने वाले, बयालीस दोष टालकर आहार—पानी लेने वाले, बावन अनाचारों को टालने—वाले, निर्लोभी, निर्लालची, संसार से उदासीन, मोक्ष के अभिलाषी, संसार से विमुख, मोक्ष के सम्मुख, सचित्त के त्यागी, अचित्त के भोगी, न्योता देने से भोजन नहीं करने वाले, बुलाने से नहीं आने वाले, वायुवत् अप्रतिबन्ध विहारी—इस प्रकार के महा उत्तम मुनिराजों के प्रति हाथ जोड़, मान मोड़ ‘तिक्खुत्तो आयाहिणं....