पंचपद वन्दना (नवीन)
णमो अरहंताणं—परम अर्हता सम्पन्न, चार घनघाती कर्म का क्षय कर अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त चारित्र, अनन्त शक्ति और आठ प्रातिहार्य इन बारह गुणों से सुशोभित, चौंतीस अतिशय, पैंतीस वचनातिशय से युक्त, धर्मतीर्थ के प्रवर्तक, वर्तमान तीर्थंकर सीमंधर आदि अर्हतों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक वन्दना—‘तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि वंदामि नमसामि सक्कारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण वंदामि ।’
णमो सिद्धाणं—परम सिद्धि संप्राप्त, अष्टकर्म क्षय कर केवलज्ञान, केवलदर्शन, असंवेदन, आत्मरमण, अटल अवगाहन, अमूर्ति, अगुरुलघु और निरन्तराय—इन आठ गुणों से सम्पन्न, परमात्मा, परमेश्वर, जन्म, मरण, जरा, रोग, शोक, दुःख, दारिद्रय रहित अनन्त सिद्धों को विनम्रभाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक वन्दना—‘तिक्खुत्तो आयाहिणं....
णमो आयरियाणं—परम आचार—कुशल, धर्मोपदेशक, धर्मधुरन्धर, बहुश्रुत, मेधावी, सत्यनिष्ठ, श्रद्धा—धृति—शक्ति—शान्ति सम्पन्न, अष्ट गणि—सम्पदा से सुशोभित, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के ज्ञाता, चतुर्विध धर्मसंघ के शास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि एवं छत्तीस गुणों के धारक वर्तमान आचार्यश्री महाश्रमण आदि धर्माचार्यों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक वन्दना—‘तिक्खुत्तो आयाहिणं.... । णमो उवज्झायाणं—परमश्रुत स्वाध्यायी, धर्मसंघ में आचार्य द्वारा नियुक्त, ग्यारह अंग तथा बारह उपांग के धारक, अध्ययन और अध्यापन में कुशल—इन पचीस गुणों से सुशोभित उपाध्यायों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक वन्दना—‘तिक्खुत्तो आयाहिणं.... ।
णमो लोए सव्वसाहूणं—अध्यात्म—साधना में संलग्न, पांच महाव्रत, पंचेन्द्रिय निग्रह, चार कषाय—विवेक, भाव सत्य, करण सत्य, योग सत्य, क्षमा, वैराग्य, मन—वचन—काय समाहरणता, ज्ञान, दर्शन, चारित्र सम्पन्नता, वेदना और मृत्यु के प्रति सहिष्णुता इन सत्ताईस गुणों से सुशोभित, परीषहजयी, प्रासुक एषणीय भोजी, अर्हत और आचार्य की आज्ञा के आराधक, तपोधन साधु—साध्वियों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक वन्दना—‘तिक्खुत्तो आयाहिणं....