‹ नित्य पाठ एवं विधि
पोषध-आलोचना पाठ
ग्यारहवें पौषध व्रत में जो कोई अतिचार (दोष) लगा हो, मैं उसकी आलोचना करता हूं/करती हूं।
१. शय्या, संथारे (सोने-बैठने के स्थान और बिस्तर) का प्रतिलेखन नहीं किया हो अथवा असावधानी से किया हो।
२. शय्या, संथारे का प्रमार्जन नहीं किया हो अथवा असावधानी से किया हो।
३. उच्चार, प्रस्रवण भूमि (मल, मूत्र, खंखार करने के स्थान) का प्रतिलेखन नहीं किया हो अथवा असावधानी से किया हो।
४. पौषध व्रत का सम्यक् प्रकार से पालन नहीं किया हो।
५. धर्म जागरिका से अपनी आत्मा को भावित न किया हो।
तस्स मिच्छा मि दुक्कडं—इनसे लगे मेरे पाप मिथ्या हों, निष्फल हों।