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नित्य पाठ एवं विधि

सामायिक आलोचना पाठ

नौवें सामायिक व्रत में जो कोई अतिचार (दोष) लगा हो, मैं उसकी आलोचना करता हूं/करती हूं।

१. मन की सावद्य प्रवृत्ति की हो।

२. वचन की सावद्य प्रवृत्ति की हो।

३. शरीर की सावद्य प्रवृत्ति की हो।

४. सामायिक की स्मृति न की हो।

५. अवधि से पहले सामायिक को पूरा किया हो।

तस्स मिच्छा मि दुक्कडं—इनसे लगे मेरे पाप मिथ्या हों, निष्फल हों।