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परिशिष्ट

बारह व्रती श्रावक की साधना

श्रावक का जीवन सादा, स्वच्छ एवं सौहार्दपूर्ण हो इसलिए निम्‍न विषयों की साधना बारह व्रती श्रावक के लिए अनिवार्य है—

1.मैं यथासंभव तामसिक भोजन नहीं करने का अभ्यास करूंगा/करूंगी ।

2.मैं प्रतिदिन कुछ समय के लिए ध्यानासनों का अभ्यास करूंगा/करूंगी ।

3.मैं निन्दा, विकथा तथा कषाय—प्रभाव से स्वयं को दूर रखने का प्रयत्‍न करूंगा/करूंगी ।

4.मैं प्रतिदिन एक घण्टे मौन का अभ्यास करूंगा/करूंगी ।

5.मैं किसी से मनमुटाव होने पर 15 दिन के अन्दर—अन्दर उनसे सरल मन से क्षमायाचना करूंगा/करूंगी ।

6.मैं धीरे—धीरे बाहरी आकर्षणों को घटाने का प्रयास करूंगा/करूंगी ।

7.भाव—शुद्धि के बिना क्रिया का कोई महत्त्व नहीं है । क्रिया से दबायी हुई वासनाएं अवसर पाकर फिर उभर जाती है । अतः काम, क्रोध आदि कषायों को जड़ से मिटाने का प्रयास करूंगा/करूंगी ।

8.जान—बूझकर व्यवहार—विरुद्ध कार्य नहीं करूंगा/करूंगी ।

9.निंदा बहुत बड़ा पाप है, किन्तु अपने प्रति उसका उपयोग किया जाए तो बहुत बड़ा धर्म बन जाता है । मन को पवित्र रखने के लिए परनिंदा नहीं करूंगा/करूंगी ।

10.साल में एक बार शिविर में अवश्य भाग लूंगा/लेंगी ।