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परिशिष्ट

उद्घोष (नारे)

जैन धर्म :

संयमः खलु जीवनम्—संयम ही जीवन है ।

श्रमण भगवान महावीर स्वामी की—जय हो ।

जिनवाणी का यह सुविधान—अपने से अपना कल्याण ।

जैन धर्म की क्या पहचान—सत्य, अहिंसा, दया प्रधान ।

महावीर का एक ही घोष—देखो अपना—अपना दोष ।

महावीर ने क्या सिखलाया—समता धर्म, समता धर्म ।

महावीर का क्या संदेश—सीखो समता, छोड़ो द्वेष ।

महावीर के संदेश को-घर-घर में पहुंचाएंगे ।

अमर रहेगा-धर्म हमारा ।।

जैन धर्म की-जय हो ।

मानव धर्म की-जय हो ।

सत्य धर्म की-जय हो ।

तेरापंथ :

क्रांतिकारी आचार्यश्री भिक्षु की—जय हो ।

गणाधिपति गुरुदेवश्री तुलसी की—जय हो ।

आचार्यश्री महाप्रज्ञजी की—जय हो ।

जय जय ज्योति चरण, जय जय महाश्रमण

गुरु भिक्षु ने क्या दिखलाया—तेरापंथ तेरापंथ ।

जयाचार्य ने क्या सिखलाया—मर्यादा और अनुशासन ।

आलोकित नभ धरा दिगंत—हे प्रभो ! यह तेरापंथ ।

श्री तुलसी का क्या उद्घोष—जन—जन में हो नैतिक जोश ।

तेरापंथ की क्या पहचान—एक गुरु और एक विधान ।

तेरापंथ की क्या पहचान—सत्य अहिंसा त्याग प्रधान ।

तेरापंथ की क्या पहचान-व्यसन—मुक्त जीवन संधान ।

प्रेक्षा ध्यान योग :

कैसे बदले जीवन धारा—प्रेक्षाध्यान साधना द्वारा ।

घर—घर में हो योग प्रचार—मिट जाएंगे रोग विकार ।

सुबह शाम का योगाभ्यास—भरता जीवन में उल्लास ।

सामयिक :

अणुव्रतों का यह संदेश—व्यसनमुक्त हो सारा देश ।

बदले युग की धारा—अणुव्रतों के द्वारा ।

जन जन में जागे विश्‍वास—संयम से व्यक्तित्व विकास ।

संघ पुरुष—चिरायु हो, चिरायु हो, चिरायु हो ।