प्रेक्षाध्यान प्रयोग पद्धति
ध्यान की पूर्व तैयारी—सावधान, ध्यान के लिए तैयार हो जाएं ।
ध्यानासन—जिस आसन में लम्बे समय तक सुविधापूर्वक स्थिरता से बैठ सकें, उस ध्यानासन का चुनाव करें । जैसे—पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन या वज्रासन ।
किसी एक मुद्रा (ब्रह्म—मुद्रा या ज्ञान—मुद्रा) का चुनाव करें—
ब्रह्म—मुद्रा—दोनों हथेलियों को नाभि के नीचे स्थापित करें । बायीं हथेली नीचे और दायीं ऊपर रहे । (अथवा)
ज्ञान—मुद्रा—दोनों हाथों को घुटनों पर टिकायें । अंगूठे और तर्जनी के अग्र भाग को मिलायें । शेष तीनों अंगुलियां सीधी रहे ।
आंखों को बिना दबाव दिये, कोमलता से बंद करें ।
अर्हम् की ध्वनि—प्रारंभ में अर्हम् की नौ बार ध्वनि करें ।
अर्हम्—ध्वनि की विधि—पहले पूरा श्वास भरकर उसे धीरे—धीरे छोड़ते समय अर्हम् का उच्चारण इस प्रकार करें—‘अ’ कार का उच्चारण करते समय चित्त नाभि पर केन्द्रित करें, (समय दो सेकंड) ‘हैं’ का उच्चारण करते समय चित्त को आनन्द केन्द्र पर केन्द्रित करें । (समय 4 सेकंड) ‘म्’ की ध्वनि करते समय चित्त को विशुद्धि केन्द्र तक ले जाएं, (समय 6 सेकण्ड) । अन्तिम नाद के समय चित्त को ज्ञानकेन्द्र पर टिकाएं (समय 1 सेकण्ड) एक सेकण्ड का समय प्रारम्भ में नाद के लिए रहे ।
ध्येय—सूत्र
संपिक्खए अप्पगमप्पएणं का उच्चारण तीन बार करें ।
आत्मा के द्वारा आत्मा को देखें । स्वयं, स्वयं को देखें ।
अपने आपको देखने के लिए ही प्रेक्षा—ध्यान का अभ्यास करें ।
ध्यान का संकल्प—मैं चित्त—शुद्धि के लिए प्रेक्षा—ध्यान का प्रयोग कर रहा हूं । (तीन बार दोहराएं)
ध्यान का पहला चरण—कायोत्सर्ग
शरीर को स्थिर, शिथिल और तनाव—मुक्त करें । मेरु—दंड और गर्दन सीधी रहे । अकड़न न हो । मांस—पेशियों को ढीला छोड़ें । शरीर की पकड़ को छोड़ें ।
पांच मिनट तक काय—गुप्ति का अभ्यास करें । प्रतिमा की भांति शरीर को स्थिर रखें । हलन—चलन न करें । पांच मिनट तक पूरी स्थिरता ।।
कायोत्सर्ग के दो अर्थ हैं—शरीर का शिथिलीकरण और अपने प्रति जागरूकता । प्रत्येक अवयव के प्रति जागरूक बनें । चित्त को पैर से सिर तक क्रमशः शरीर के प्रत्येक भाग पर ले जाएं । पूरे भाग में चित्त की यात्रा करें ।
शिथिलता का सुझाव दें और उसका अनुभव करें । प्रत्येक मांसपेशी और प्रत्येक स्नायु शिथिल हो जाये । पूरे शरीर की शिथिलता को साधे । गहरी एकाग्रता । पूरी जागरूकता । कायोत्सर्ग.... ।
*(जब नये साधकों को अभ्यास कराना हो तो दाहिने पांव के अंगूठे से क्रमशः सिर तक प्रत्येक भाग का नाम लेते हुए शिथिल कराएं । जैसे—दाहिने पैर के अंगूठे पर चित्त को ले जाएं—पूरे भाग में चित्त को घुमाएं, चित्त की यात्रा करें । शिथिलता का सुझाव दें—शिथिल हो जाएं । (तीन बार)....शिथिल हो रहा है । (तीन बार) अनुभव करें । शिथिल हो गया है (तीन बार)—इस प्रकार पूरे कायोत्सर्ग की विधि में दिए गये ‘प्रत्येक अंगुली, पंजा, तलुवा’ आदि अवयवों के नामों को क्रमशः बोल कर पूरे शरीर को शिथिल कराएं ।)
(दो मिनट बाद) अनुभव करें—शरीर का एक—एक भाग शिथिल होता जा रहा है । शरीर के प्रत्येक भाग में हलकेपन का अनुभव करें । पैर से सिर तक पूरा शरीर शिथिल हो गया है ।
पूरे ध्यान काल तक कायोत्सर्ग की मुद्रा बनी रहे । शरीर को अधिक से अधिक स्थिर और निश्चल रखने का अभ्यास करें ।
पांच मिनट अन्तर मौन का अभ्यास करें । कंठ का कायोत्सर्ग करें । चित्त को स्वर—यन्त्र पर केन्द्रित करें । स्वर—यन्त्र की शिथिलता को साधें ।
ध्यान का दूसरा चरण-अन्तर्यात्रा
प्रथम विकल्प—(नए साधकों को यह प्रयोग कराएं)
चित्त को शक्ति—केन्द्र पर ले जाएं । ऊपर उठाएं, सुषुम्ना के मार्ग से ज्ञान केन्द्र तक लाएं, फिर उसी मार्ग से शक्ति केन्द्र तक नीचे लाएं । नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे, सुषुम्ना में चित्त की यात्रा चले । सुषुम्ना में होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें । पूरी चेतना को सुषुम्ना में समेट लें । (एक दो मिनट के बाद) ।
चित्त की गति को श्वास की गति के साथ जोड़े । श्वास छोड़ते समय चित्त को नीचे से ऊपर ले जाएं और श्वास लेते समय चित्त को ऊपर से नीचे लाएं ।
(प्रारम्भ में ब्लडप्रेशर मापने के यन्त्र के उदाहरण से पारे की तरह चित्त को ऊपर—नीचे घुमाने की बात समझा दें । प्रशिक्षण के समय इस बात को स्पष्ट कर दें ।)
दूसरा विकल्प—(अभ्यास की परिपक्वता के पश्चात् यह प्रयोग कराएं) ।
चित्त को शक्ति केन्द्र पर ले जायें, ऊपर उठाएं, सुषुम्ना के मार्ग से आनन्द—केन्द्र तक लाएं । फिर उसी मार्ग से नीचे लाएं । सुषुम्ना में चित्त की यात्रा चले । पूरा ध्यान अन्तर्यात्रा के पथ पर रहे । आनन्द केन्द्र से शक्ति केन्द्र और शक्ति केन्द्र से आनन्द केन्द्र पर चित्त की यात्रा चले । वहां होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें ।
चित्त की गति को श्वास की गति के साथ जोड़े । श्वास लेते समय चित्त को आनन्द—केन्द्र से शक्ति—केन्द्र की ओर ले जाएं । श्वास छोड़ते समय चित्त को शक्ति—केन्द्र से आनन्द केन्द्र की ओर लाएं ।
तीसरा विकल्प—(परिपक्वता के पश्चात् यह प्रयोग कराएं ।) उपरोक्त विधि से चित्त को शक्ति—केन्द्र से क्रमशः प्रत्येक चैतन्य—केन्द्र की यात्रा करते हुए पुनः शक्ति केन्द्र पर लाएं ।
ध्यान का तीसरा चरण—(1) दीर्घ श्वास प्रेक्षा
श्वास की गति को मन्द करें । लम्बा श्वास लें, लम्बा श्वास छोड़ें । श्वास लयबद्ध और सम—ताल चले । पहली बार श्वास को लेने
और छोड़ने में जितना समय लगे, दूसरी बार भी उतना ही समय लगे, तीसरी बार भी उतना ही समय लगे ।’—इस सुझाव को प्रारम्भ में एक—दो बार दिया जाये ।
श्वास के कम्पन नाभि तक पहुंचे । श्वास लेते समय पेट की मांसपेशियां फूलती है, छोड़ते समय सिकुड़ती हैं । चित्त को नाभि पर केन्द्रित करें और पेट की मांसपेशियों के फूलने और सिकुड़ने का अनुभव करें तथा उसके द्वारा प्रत्येक आते और जाते श्वास का अनुभव करें । प्रत्येक श्वास की जानकारी बनी रहे ।
गहरी एकाग्रता और पूरी जागरूकता के साथ दीर्घश्वासप्रेक्षा का अभ्यास करें ।....अभ्यास की निरन्तरता को बनाये रखें ।
(कुछ समय बाद) चित्त को नाभि से हटाकर दोनों नथुनों के भीतर सन्धि—स्थल पर केन्द्रित करें । पूरा व लम्बा, लयबद्ध श्वास चालू रखते हुए आते—जाते प्रत्येक श्वास का अनुभव करें, प्रेक्षा करें ।
(बीच—बीच में यह सुझाव देते रहें ।) पूरा, लम्बा, लयबद्ध श्वास चालू रहे । प्रत्येक श्वास को जानते हुए लें, जानते हुए छोड़े । चित्त की सारी शक्ति श्वास को देखने में लगा दें । केवल श्वास का अनुभव करें....
(एक—दो बार यह सुझाव दें—) यदि विकल्प आते हैं तो उन्हें रोकने का प्रयत्न न करें । केवल द्रष्टाभाव से देखें और बीच—बीच में श्वास संयम का प्रयोग करें या जीभ को उलटकर तालु से लगा दें । श्वास के प्रति पूर्ण जागरूक रहें । केवल श्वास का ही अनुभव करें ।
ध्यान का तीसरा चरण—(2) समवृत्ति श्वास प्रेक्षा—
(1) श्वास की गति को मन्द करें । पूरा, लम्बा श्वास लें, पूरा, लम्बा श्वास छोड़ें । श्वास को लयबद्ध और समताल करें । श्वास को लेने में जितना समय लगे, उतना ही समय श्वास को छोड़ने में लगे ।
बाएं नथुने से श्वास लें, दायें से निकालें, फिर दायें से लें और बाएं से निकालें । संकल्प—शक्ति के द्वारा ऐसा करें । यदि संकल्प—शक्ति के सहारे न कर सकें तो अंगुली और अंगूठे के सहारे करें । (प्रशिक्षण के समय अंगुली और अंगूठे का प्रयोग बता दें) ।
श्वास के साथ चित्त को जोड़े । चित्त और श्वास दोनों साथ—साथ चले । केवल श्वास का अनुभव करें । समवृत्ति श्वास प्रेक्षा ।
(कुछ समय बाद बीच—बीच में यह सुझाव देते रहें) चित्त और श्वास साथ—साथ चले । श्वास भीतर, चित्त भीतर । श्वास बाहर, चित्त बाहर ।)
(2) श्वास संयम के साथ समवृत्ति श्वास प्रेक्षा
1.बाएं नथुने से श्वास लें और उसे भीतर रोकें ।
2.दायें नथुने से निकालें और उसे बाहर रोकें ।
3.दायें से लें और उसे भीतर रोकें ।
4.बाएं से निकालें और उसे बाहर रोकें ।
प्रत्येक आवृत्ति में इस प्रकार चार बार श्वास संयम का प्रयोग करें ।
यह ध्यान रहे कि जितने समय तक सुविधा से रोक सकते हैं, उतने समय तक ही रोकें । एक सेकण्ड से पांच सेकण्ड तक । जबरदस्ती बिल्कुल न करें । श्वास के प्रति जागरूक रहें ।
ध्यान का तीसरा चरण—(3) शरीर प्रेक्षा
(शरीर प्रेक्षा में हमें शरीर को देखना है । खुली आंखों से नहीं, चित्त से । आंखें बन्द रहेंगी । चित्त को शरीर के प्रत्येक अवयव पर ले जाकर वहां पर होने वाले परिणमन, स्पन्दन, प्रकंपन या संवेदन आदि को द्रष्टाभाव से देखना है । कपड़े का स्पर्श, पसीना, खुजली, दर्द आदि जो कुछ अनुभव हो, उसे देखना है, केवल देखना है । उसका अनुभव करना है इस बात को प्रशिक्षण में स्पष्ट कर दें तथा प्रयोग के साथ बताएं)
चित्त को दाएं पैर के अंगूठे पर केन्द्रित करें । पूरे भाग में चित्त की यात्रा करें । वहां होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें । केवल जाने और अनुभव करें । प्रियता और अप्रियता से मुक्त रहकर केवल द्रष्टाभाव से देखें ।
इसी तरह अंगुलियां...पंजा....तलवा....एड़ी....टखना.... पिण्डली... घुटना.... साथल.... और कटिभाग ।
(प्रत्येक अवयव पर आधा से एक मिनिट प्रेक्षा कराएं) (प्राण के प्रकम्पनों को....द्रष्टाभाव से देखें इस वाक्य को प्रत्येक अवयव के साथ बोलना जरूरी नहीं है । बीच—बीच में एक—दो बार दोहराएं ।)
इसी प्रकार बायां पैर....(प्रत्येक अवयव का नाम लेकर आधा से एक मिनट तक प्रेक्षा कराएं) अधोलोक की यात्रा सम्पन्न ।
अब मध्यलोक की यात्रा प्रारम्भ करें । पेडू के पूरे भाग में चित्त की यात्रा करें—दायें—बायें, आगे—पीछे, बाहर—भीतर—प्रत्येक भाग में चित्त को केन्द्रित करें और वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें । केवल द्रष्टाभाव से देखें ।....(एक—दो मिनट बाद) इसी तरह पेट के पूरे भाग की प्रेक्षा करें ।....(एक से दो मिनट)
अब पेट के प्रत्येक भीतरी अवयव की प्रेक्षा करें । दोनों गुर्दे.... बड़ी आंत.... छोटी आंत.... अग्न्याशय (पेन्क्रियाज)....पक्वाशय (डियोडिनम)....आमाशय....तिल्ली (स्प्लीन)....(लिवर) और तनुपट (डायाफ्राम).... (प्रत्येक अवयव पर 20 से 30 सेकंड रुकें ।)
अब वक्षस्थल (छाती) के पूरे भाग की यात्रा करें—दाएं—बाएं, आगे—पीछे, बाहर और भीतर, प्रत्येक भाग में चित्त को केन्द्रित करें और वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें । अब वक्षस्थल के प्रत्येक अवयव की प्रेक्षा करें—हृदय....दायीं पसलियां....बायीं पसलियां....दायां फेफड़ा.... बायां फेफड़ा । ....पीठ का पूरा भाग—मेरुदण्ड, सुषुम्ना, सुषुम्ना—शीर्ष.... ।।
अब दोनों हाथों की प्रेक्षा करें । दायां हाथ....अंगूठा.... अंगुलियां....हथेली.... मणिबंध (कलाई)....कलाई से कुहनी तक.... कुहनी से कन्धे तक की प्रेक्षा करें । इसी प्रकार बाएं हाथ के अंगूठे से कन्धे तक एक—एक भाग की प्रेक्षा करें ।.... ।
कंठ.... स्वरयन्त्र.... गर्दन.... प्रत्येक भाग पर क्रमशः चित्त की यात्रा करें और प्रेक्षा करें । मध्यलोक की यात्रा सम्पन्न ।।
अब ऊर्ध्वलोक की यात्रा प्रारम्भ करें—ठुड्डी.... होंठ....मुंह.... मसूढ़े....दांत....जीभ....तालु....दायां कपोल.... बायां कपोल.... नाक.... दायीं आंख.... बायीं आंख.... दायीं कनपटी, दायां कान.... बायीं कनपटी, बायां कान....ललाट.... और सिर । प्रत्येक भाग की प्रेक्षा करें । ऊधर्वलोक की यात्रा सम्पन्न ।
अब एक साथ पूरे शरीर की प्रेक्षा करें । जो आसानी से खड़े—खड़े कर सकते हैं, खड़े—खड़े करें ।
चित्त में यह क्षमता है कि वह एक बिन्दु पर केन्द्रित हो सकता है और पूरे शरीर में एक साथ फैल सकता है । चित्त को पैर के दोनों अंगूठों पर केन्द्रित करें । पूरे शरीर के आकार में फैलाते हुए पैर से सिर तक शीघ्रता से ले जाएं । उसी गति से सिर से पैर तक लाएं । बीच—बीच में श्वास—संयम के साथ शरीर—प्रेक्षा का प्रयोग करें । शरीर के कण—कण का स्पर्श करें । शरीर का कण—कण चेतना और प्राण के स्पर्श से झंकृत हो उठे । अनुभव करें, जैसे पूरे शरीर में बिजली की धारा दौड़ रही है । कपड़े का स्पर्श, पसीना, खुजली, स्पन्दन, दर्द जो कुछ हो रहा है, उसका तटस्थ भाव से अनुभव करें ।
अब धीमी गति से चित्त की यात्रा चले । कहीं पीड़ा, अवरोध हो उस पर कुछ क्षणों के लिए रुकें । केवल जानें । पूर्ण समभाव रहे । (तीन मिनट)
ध्यान का तीसरा चरण—(4) चैतन्य—केन्द्र—प्रेक्षा
(चैतन्य—केन्द्र—प्रेक्षा जागरण की प्रक्रिया है । सुप्त चैतन्य केन्द्रों को प्रेक्षा के द्वारा जागृत करना है । चैतन्य—केन्द्र—प्रेक्षा में प्रत्येक केन्द्र पर चित्त को केन्द्रित करें और वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें । गहरी एकाग्रता, पूरी जागरूकता बनी रहे । केवल देखें—यह सुझाव प्रारम्भ में एक—दो बार दें ।)
1. शक्ति केन्द्र—चित्त को शक्ति केन्द्र—पृष्ठरज्जु के निचले सिरे पर केन्द्रित करें । वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें । केवल शक्ति केन्द्र के प्रति पूर्ण जागरूक रहें । पूरी एकाग्रता बनी रहे ।
2. स्वास्थ्य केन्द्र—चित्त को स्वास्थ्य केन्द्र—पेडू के मध्य भाग पर केन्द्रित करें । आगे से पीछे सुषुम्ना तक चित्त के प्रकाश को पूरे भाग में फैलाएं । वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें ।
3. तैजस केन्द्र—चित्त को तैजस केन्द्र—नाभि के स्थान पर केन्द्रित करें । आगे से पीछे सुषुम्ना तक पूरे भाग में चित्त को फैलाएं । जैसे टॉर्च का प्रकाश सीधी रेखा में फैलता है, वैसे ही चित्त के प्रकाश को सीधी रेखा में पीछे तक फैलाएं । वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें । गहरी एकाग्रता के साथ अनुभव करें, जिससे स्वतः ही श्वास—संयम हो जाये ।
4. आनन्द केन्द्र—चित्त को आनन्द केन्द्र—हृदय के पास (दोनों फुप्फुस के बीच में) जो गड्ढ़ा है वहां पर केन्द्रित करें । आगे से पीछे सुषुम्ना तक टॉर्च के प्रकाश की भांति चित्त के प्रकाश को फैलाएं और वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें । बीच—बीच में श्वास—संयम का प्रयोग करें ।
5. विशुद्धि केन्द्र—चित्त को विशुद्धि केन्द्र—कण्ठ के मध्य भाग पर केन्द्रित करें । आगे से पीछे सुषुम्ना तक चित्त के प्रकाश को पूरे भाग में फैलाएं । वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें । बीच—बीच में श्वास—संयम का प्रयोग करें ।
6. ब्रह्म केन्द्र—चित्त को ब्रह्म केन्द्र—जीभ के अग्र भाग पर केन्द्रित करें । जीभ अधर में रहे । वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें ।
7. प्राण केन्द्र—चित्त को प्राण केन्द्र—नासाग्र पर केन्द्रित करें । वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें ।
8. अप्रमाद केन्द्र—चित्त को अप्रमाद केन्द्र—दोनों कानों पर—भीतरी मध्य और बाहरी भाग पर तथा आस—पास के भाग पर केन्द्रित करें । वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें ।
9. चाक्षुष केन्द्र—चित्त को चाक्षुष केन्द्र—दोनों आंखों के भीतर केन्द्रित करें, वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें ।
10. दर्शन केन्द्र—चित्त को दर्शन केन्द्र—दोनों आंखों और भृकुटियों के मध्य भाग पर केन्द्रित करें । भीतर गहराई तक चित्त को ले जाएं । आगे से पीछे—मस्तिष्क के पीछे की दीवार तक चित्त के प्रकाश को फैला दें । वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें । गहरी एकाग्रता और पूरी जागरूकता के साथ केवल अनुभव करें, प्रेक्षा करें । बीच—बीच में श्वास—संयम का प्रयोग करें ।
11. ज्योति केन्द्र—चित्त को ज्योति केन्द्र ललाट के मध्य भाग पर केन्द्रित करें । भीतर गहराई में चित्त को ले जाएं । आगे से पीछे मस्तक के पीछे के भाग तक पूरे भाग में चित्त के प्रकाश को फैलाएं । वहां होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें । बीच—बीच में श्वास—संयम का प्रयोग करें ।
12. शान्ति केन्द्र—चित्त को शान्ति केन्द्र—सिर के अग्र भाग में केन्द्रित करें । जैसे दीये का प्रकाश चारों दिशाओं में फैलता है, वैसे ही चित्त के प्रकाश को शान्ति केन्द्र पर फैलाएं और उसे गहराई तक ले जाएं । वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें ।
13. ज्ञान केन्द्र—चित्त को ज्ञान केन्द्र—सिर के ऊपर के भाग, चोटी के स्थान पर केन्द्रित करें । दीये के प्रकाश की भांति पूरे भाग में चित्त के प्रकाश को फैलाएं । गहराई तक चित्त को ले जाएं । वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें ।
अब एक साथ सभी चैतन्य केन्द्रों की प्रेक्षा करें । जो खड़े—खड़े कर सकते हैं वे खड़े—खड़े करें । चित्त को शक्ति केन्द्र पर ले जाएं, फिर क्रमशः स्वास्थ्य—केन्द्र, तैजस—केन्द्र, आनन्द—केन्द्र....आदि सभी केन्द्रों पर होते हुए पुनः शक्ति केन्द्र पर ले आएं । वृत्ताकार में सभी चैतन्य केन्द्रों पर चित्त की यात्रा चले । तेजी के साथ चित्त को सभी चैतन्य केन्द्रों पर घुमाएं और वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें ।
(दो—तीन मिनट)
ध्यान का तीसरा चरण—(5) लेश्या—ध्यान
प्रत्येक मनुष्य के शरीर के चारों तरफ एक आभामण्डल होता है । उसके रंग भाव—परिवर्तन के साथ बदलते रहते हैं । भाव और आभा—मण्डल का गहरा संबंध है । हम भावशुद्धि के द्वारा आभामण्डल को विशुद्ध बना सकते हैं और आभामण्डल की विशुद्धि से भाव की विशुद्धि को जाना जा सकता है । (यह जानकारी पहले प्रयोग के समय या प्रशिक्षण के समय दें ।)
आनन्द केन्द्र पर हरे रंग का ध्यान
अनुभव करें अपने चारों ओर पन्ने की भांति चमकते हुए हरे रंग का प्रकाश फैल रहा है । हरे रंग के परमाणु फैल रहे हैं । अब इस हरे रंग का श्वास लें । अनुभव करें—प्रत्येक श्वास के साथ हरे रंग के परमाणु शरीर के भीतर प्रवेश कर रहे हैं । चित्त को आनन्द केन्द्र पर केन्द्रित करें । वहां पर चमकते हुए हरे रंग का ध्यान करें ।
(कुछ समय बाद) अनुभव करें—आनन्द केन्द्र से हरे रंग के परमाणु निकलकर शरीर के चारों ओर फैल रहे हैं । पूरा आभामण्डल हरे रंग के परमाणुओं से भर रहा है । उन्हें देखें, अनुभव करें ।....अनुभव करें, भाव धारा निर्मल हो रही है, भाव धारा निर्मल हो रही है, भाव धारा निर्मल हो रही है ।)
विशुद्धि केन्द्र पर नीले रंग का ध्यान
अनुभव करें—अपने चारों ओर मयूर की गर्दन की भांति चमकते हुए नीले रंग का प्रकाश फैल रहा है । नीले रंग के परमाणु फैल रहे हैं । अब
इस नीले रंग का श्वास लें । अनुभव करें—प्रत्येक श्वास के साथ नीले रंग के परमाणु शरीर के भीतर प्रवेश कर रहे हैं । चित्त को विशुद्धि केन्द्र पर केन्द्रित करें । वहां पर चमकते हुए नीले रंग का ध्यान करें ।
(कुछ समय बाद) अनुभव करें—विशुद्धि केन्द्र से नीले रंग के परमाणु निकलकर शरीर के चारों ओर फैल रहे हैं । पूरा आभामण्डल नीले रंग के परमाणुओं से भर रहा है । उन्हें देखें, अनुभव करें ।....अनुभव करें—वासनाएं अनुशासित हो रही हैं, वासनाएं अनुशासित हो रही हैं, वासनाएं अनुशासित हो रही हैं ।
दर्शन केन्द्र पर अरुण रंग का ध्यान
अनुभव करें—अपने चारों ओर बाल सूर्य की भांति चमकते हुए अरुण रंग का प्रकाश फैल रहा है । अरुण रंग के परमाणु फैल रहे हैं । अब इस अरुण रंग का श्वास लें, अनुभव करें—प्रत्येक श्वास के साथ अरुण रंग के परमाणु शरीर के भीतर जा रहे हैं । चित्त को दर्शन केन्द्र पर केन्द्रित करें । वहां पर चमकते हुए अरुण रंग का ध्यान करें ।
(कुछ समय बाद) अनुभव करें—दर्शन केन्द्र से अरुण रंग के परमाणु निकलकर शरीर के चारों ओर फैल रहे हैं । पूरा आभामण्डल अरुण रंग के परमाणुओं से भर रहा है । उन्हें देखें, अनुभव करें.... अनुभव करें—अन्तर्दृष्टि जाग रही है, अन्तरर्दृष्टि जाग रही है, अन्तर्दृष्टि जाग रही है ।
आनन्द जाग रहा है, आनन्द जाग रहा है, आनन्द जाग रहा है ।
ज्ञान केन्द्र पर पीले रंग का ध्यान*
अनुभव करें—अपने चारों ओर सूर्यमुखी के फूल या स्वर्ण की भांति चमकते हुए पीले रंग का प्रकाश फैल रहा है—पीले रंग के परमाणु फैल रहे हैं । अब इस पीले रंग का श्वास लें । अनुभव करें—प्रत्येक श्वास के साथ पीले रंग के परमाणु शरीर के भीतर प्रवेश कर रहे हैं । चित्त को ज्ञान केन्द्र पर केन्द्रित करें । वहां पर चमकते हुए पीले रंग का ध्यान करें ।
(कुछ समय बाद) अनुभव करें—ज्ञान केन्द्र से पीले रंग के परमाणु निकलकर शरीर के चारों ओर फैल रहे हैं । पूरा आभामण्डल पीले रंग के परमाणु से भर रहा है । उन्हें देखें अनुभव करें । ....अनुभव करें—ज्ञान—तंतु विकसित हो रहे हैं, ज्ञान—तंतु विकसित हो रहे हैं, ज्ञान—तंतु विकसित हो रहे हैं ।
ज्योति केन्द्र पर श्वेत रंग का ध्यान
अनुभव करें—अपने चारों ओर पूर्णिमा के चन्द्रमा के प्रकाश की भांति चमकता हुआ श्वेत रंग का प्रकाश फैल रहा है—श्वेत रंग के परमाणु फैल रहे हैं । अब इस श्वेत रंग का श्वास लें । अनुभव करें—प्रत्येक श्वास के साथ श्वेत रंग के परमाणु शरीर के भीतर प्रवेश कर रहे हैं । चित्त को ज्योति केन्द्र पर केन्द्रित करें । वहां पर चमकते हुए श्वेत रंग का ध्यान करें ।
(कुछ समय बाद) अनुभव करें—ज्योति केन्द्र से श्वेत रंग के परमाणु निकलकर शरीर के चारों ओर फैल रहे हैं । पूरा आभामण्डल श्वेत रंग के परमाणुओं से भर रहा है । उन्हें देखें, अनुभव करें । अनुभव करें—क्रोध शांत हो रहा है । आवेश और आवेग शांत हो रहे हैं, वासनाएं शांत हो रही हैं, पूर्ण शान्ति मिल रही है । अनुभव करें—पूर्ण शान्ति मिल रही है, पूर्ण शान्ति मिल रही है ।
ध्यान का चौथा चरण—ज्योति केन्द्र प्रेक्षा
चित्त को ललाट के मध्य भाग में ज्योति केन्द्र पर केन्द्रित करें और वहां पर श्वेत रंग का ध्यान करें, जैसे पूर्णिमा का चांद उग रहा है, उसकी श्वेत रश्मियां ज्योति केन्द्र पर गिर रही है अथवा किसी भी चमकती हुई श्वेत वस्तु का आलम्बन लें । ज्योति केन्द्र पर सफेद रंग का साक्षात्कार करें ।....
अनुभव करें—पूर्णिमा के चांद की श्वेत किरणें ज्योति केन्द्र पर गिर रही हैं । अनुभव करें—क्रोध शांत हो रहा है । आवेश और आवेग शांत हो रहे हैं । वासनाएं शांत हो रही हैं ।
(दो या तीन मिनट के बाद) अब चित्त को पूरे ललाट पर फैलाएं, पूरे ललाट पर श्वेत रंग का ध्यान करें । अनुभव करें कि पूरे ललाट में भीतर तक श्वेत रंग के परमाणु प्रवेश कर रहे हैं । पूरा ललाट श्वेत रंग के परमाणुओं से भर गया है ।
शान्ति व आनन्द का अनुभव करें ।
(तीन दीर्घ श्वास के साथ प्रयोग सम्पन्न करें ।)
विवेक सूत्र
(1)अप्पणा सच्चमेसेज्जा मेत्तिं भूएस कप्पए ।
(स्वयं सत्य खोजें, सबके साथ मैत्री करें ।)
(2)आहंसु विज्जा चरणं पमोक्खें ।
(दुःख—मुक्ति के लिए विद्या और आचार का अनुशीलन करें ।)
शरण सूत्र : अरहंते सरणं पवज्जामि, सिद्धे सरणं पवज्जामि, साहू सरणं पवज्जामि, केवलि—पण्णत्तं धम्मंसरणं पवज्जामि ।
श्रद्धा सूत्र : वन्दे सच्चं, वन्दे सच्चे, वन्दे सच्चं ।
विधि—वन्दनासन की मुद्रा में पहले पूरा श्वास भरें, श्वास छोड़ते हुए वन्दे बोलते हुए सिर सामने रहे, सच्चं बोलते हुए नीचे जमीन तक झुकें, फिर श्वास भरते हुए ऊपर उठे । यह क्रम तीन बार दोहराएं ।
* कोष्ठक में दिए गए शब्द निर्देश देते समय नहीं बोले ।
* नोट : यह ध्यान चक्षुष् केन्द्र पर भी कराया जा सकता है ।