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श्रावक साधना

गोचरी सम्बन्धी आवश्यक जानकारी

जैन मुनि की भिक्षा विधि को ‘गोचरी’ कहा जाता है । जैसे गाय अच्छी—बुरी घास का भेद किये बिना एक ओर से दूसरी ओर चली जाती है, किसी भी पौधे को जड़ से नहीं उखाड़ती । वैसे ही साधु छोटे—बड़े कुल का भेद न करते हुए एवं प्रिय—अप्रिय आहार में राग—द्वेष न करते हुए अनेक घरों से थोड़ा—थोड़ा ग्रहण कर अपना काम चलाते हैं ।

जैन मुनि की भिक्षा विधि की अनेक मर्यादाएं हैं । वे शुद्ध भिक्षा ग्रहण करते हैं ।

शुद्ध भिक्षा से तात्पर्य है—

1.जिस घर से साधु भिक्षा ले उस घर में मांस, मदिरा आदि अभक्ष्य | पदार्थों का खुला व्यवहार न होता हो ।

2.साधु के निमित्त बना हुआ, खरीदा हुआ आदि न हो ।

3.साधु को दी जाने वाली वस्तु सचित्त पानी, सचित्त वनस्पति, सचित्त नमक, अग्‍नि आदि का स्पर्श न करती हो ।

4.भिक्षा देने वाला व्यक्ति किसी भी प्रकार की सचित्त वस्तु से संपृक्त न हो ।

सचित्त—अचित्त क्या है ?

सचित्त अर्थात् सजीव । जैसे गेहूं, बाजरा आदि धान्य तथा नमक, जीरा, हरे शाक, हरी सब्जियां, जल, अग्‍नि आदि ।

अचित्त अर्थात् निर्जीव । जैसे रोटी, दाल (टुकड़े की हुई), मेवा, मिष्‍टान्‍न, उबली हुई सब्जियां आदि ।

सूझता—असूझता क्या है ?

सूझता—असूझता ये दोनों शब्द जैन परम्परा के साधुओं की भिक्षाचरी से सम्बन्धित पारिभाषिक शब्द है । सूझता अर्थात् शुद्ध, असूझता अर्थात् अशुद्ध । सूझता असूझता द्रव्य भी होता है, घर भी होता है और व्यक्ति भी होता है ।

1.सूझती वस्तु उसे कहते हैं जो सचित्त पदार्थ पर रखी हुई न हो, सचित्त का स्पर्श न होता हो, सचित्त से ढकी हुई न हो । बीज आदि का मिश्रण न हो । पूर्व कर्म एवं पश्‍चात् कर्म (भिक्षा देने से पहले की गयी हिंसा—पूर्व कर्म एवं शिक्षा देने के बाद होने वाली हिंसा—पश्‍चात् कर्म जैसे देने से पहले एवं देने के बाद कच्चे पानी से हाथ, बर्तन आदि धोना) दोष से युक्त न हो ।

2.सूझता व्यक्ति वह होता है जिसके पास भिक्षा देते समय कोई सचित्त वस्तु—पान, इलायची आदि न हो । जिसके हाथ सचित्त से संपृक्त न हो । जिसके कपड़ों में कांटा आदि न लगा हो ।

3.उस समय घर असूझता हो जाता है जब भिक्षा देने वाला व्यक्ति देते समय किसी पदार्थ के फूंक मार दे, जेब में सचित्त पदार्थ एवं कपड़ों में कांटा आदि हो, ऊपर से गिराता हुआ दे ।

घर असूझता होने पर उस दिन उस जगह से उस घर की कोई भी वस्तु उस स्थान से साधु के लिए अकल्पनीय होती है ।

4.दान देते समय गोचरी के लिए बिजली को ऑन—ऑफ करने से दाता असूझता समझा जाता है । साधु—सन्तों के लिए फ्रीज से निकालकर तत्काल वस्तु बहराना अकल्पनीय है ।

नितपिण्ड और सित्पिण्ड क्या है ?

पहले दिन जिस घर अथवा स्थान से भिक्षा ली हुई हो, दूसरे दिन उस घर की भिक्षा नितपिण्ड भिक्षा कहलाती है । यह भिक्षा साधु के लिए सामान्यतः वर्जनीय है ।

साधु रोटी, राबड़ी, छाछ और पानी—इन चार पदार्थों के अतिरिक्त कोई भी वस्तु मांगकर नहीं ले सकता, पर बीमारी की अवस्था में औषधि के रूप में दूध, चाय आदि वस्तुएं मांगकर ली जा सकती हैं एवं नितपिण्ड भी ली जा सकती है ।

शय्यातर कौन होता है ?

शय्या का अर्थ है—मकान । मकान का दान देकर तरने वाला शय्यातर होता है । इसका सीधा अर्थ यह है कि जिसके मकान में साधु रहते हैं उस घर का मालिक शय्यातर कहलाता है । जिस दिन साधु उस घर में प्रवेश करें, उस दिन उस घर की गोचरी की जा सकती है, पर दूसरी रात या उससे अधिक उसी मकान में सोना होता हो तो अगले दिन उस घर से कोई भी वस्तु नहीं ली जा सकती ।

गोचरी के बयालीस दोषों में से कतिपय दोष

1.आधाकर्म—साधु का उद्देश्य रखकर बनाना ।

2.मिश्रजात—अपने और साधु के लिए एक साथ बनाना ।

3.क्रीत—साधु के लिए खरीदकर लाना ।

4.प्रामित्य—साधु के लिए उधार लाना ।

5.परिवर्तित—साधु के लिए अट्टा—सट्टा करके लाना ।

6.मालापहृत—ऊपर की मंजिल से या छींके आदि से उतार कर देना ।

7.अनिसृष्‍ट—दूसरे व्यक्तियों के हिस्से की चीज बिना आज्ञा देना ।

8.अध्यवपूरक—अपने लिए बनाए जाने वाले भोजन में और बढ़ा देना ।

9.म्रक्षित—सचित्त का संघट्टा होने पर आहार देना ।

10.उन्मिश्र—सचित्त से मिश्रित आहार देना ।

11.प्राभृतिका—बहराने के लिए जीमनवार आदि आगे—पीछे करना ।