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श्रावक साधना

श्रावक कैसा हो ?

1.अक्षुद्र—जिसका जीवन—व्यवहार अक्षुद्र अर्थात् गम्भीर हो ।

2.रूपवान—शरीर व इन्द्रियों से सक्षम व मजबूत अस्थि—संस्थान वाला हो ।

3.प्रकृति सौम्य—जिसके स्वभाव में शान्ति और सहिष्णुता का भाव हो ।

4.लोकप्रिय—अपने व्यवहारों से समाज में लोकप्रियता प्राप्त की हो ।

5.अक्रूर—जो क्रूरता प्रभावित दमन और शोषण को प्रश्रय नहीं देता हो ।

6.पापभीरु—पापात्मक कार्यों को करते संकोच का जिसे अनुभव हो ।

7.अशठ—जिसके जीवन में छल, प्रपंच, माया, धूर्तता न हो ।

8.सुदक्ष—जो सभी आवश्यक कार्य कुशलता पूर्वक करता हो तथा जिसकी कार्यविधि सभी के लिए अनुकरणीय हो ।

9.लज्जालु—अकरणीय कार्यों से दूर रहकर सदाचारी हो ।

10.दयालु—क्षमा, दया, करुणा, प्रेम आदि के भाव रखता हो ।

11.मध्यस्थ—राग और द्वेष—वश किसी का पक्ष नहीं लेकर जो न्याय का आदान प्रदान करता हो ।

12.गुणानुरागी—गुणवान व्यक्तियों का बहुमान, निर्गुण व्यक्तियों की उपेक्षा तथा गुण संग्रह में तत्पर रहता हो ।

13.सत्कथ—विवेक ही धर्म है, यह सोचकर सदा सत्य बोलता हो ।

14.सुपक्षयुक्त—जो अपनी धर्म यात्रा में परिवार को अनुकूल बनाये रखने में समर्थ हो ।।

15.सुदीर्घदर्शी—जो सुदूर भावी परिणामों को सोचकर चलता हो ।

16.विशेषज्ञ—जिसे हेय—ज्ञेय तथा उपादेय पदार्थों की विशेष जानकारी हो ।

17.वृद्धानुयायी—वृद्धों के अनुभवों का जो अनुगमन करता हो ।

18.विनीत—मोक्ष प्राप्ति का मूल विनय है । यह सोचकर सबके प्रति जो विनम्र व्यवहार करता हो ।

19.कृतज्ञ—जो अपने धर्माचार्य को परम उपकारी मानता हो ।

20.परहितकारी—जो औरों को न्याय मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता हो ।

21.लब्ध—लक्ष्य—जिसे अपने लक्ष्य का विवेक व स्थिरता प्राप्त हो गयी हो ।