श्रावक प्रायश्चित्त-विधि
श्रावक प्रायश्चित्त-विधि
साधु—साध्वियों का योग हो तो उन्हीं के पास आलोचना करके प्रायश्चित्त लेना चाहिए । किसी कारणवश उनका योग न हो तो भगवान की साक्षी से निम्नलिखित विधि के अनुसार प्रायश्चित्त कर लेना चाहिए—
1.एक सामायिक में एक सचित्त कांटा आदि निकले तो 25 बार नमस्कार मंत्र का जाप, दो निकले तो 50 बार, इसी प्रकार बढ़ाते रहें ।
2.वर्षा आदि के कारण से सामायिक में कच्चे पानी के छींटे लगे हों तो साधारण छींटों के लिए एक माला और ज्यादा लगे तो 3,4,5 माला फेरें ।
3.लघु शंका आदि के कारण रात को सामायिक में अछाया लगे तो 3,4 नमस्कार महामंत्र की माला फेरें ।
4.सामायिक में कृमि, कीड़ी, मक्खी आदि द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय एवं चतुरिन्द्रिय जीव की विराधना हो तो 2,3,4 नमस्कार महामंत्र की माला फेरें ।
5.सामायिक में खुले मुंह बोला जाये तथा छींक—उबासी आते समय यतना न रहे तो एक माला फेरें । भूल से जल्दी पूरी कर ली जाये तो एक सामायिक तथा जान बूझकर अधूरी पारे तो तीन सामायिक करें ।
6.नवकारसी, प्रहरसी आदि भूल से टूट जाये तो जितना समय शेष हो उतना पुनः करें और जान बूझकर तोड़ी हो तो एक—एक की तीन सामायिक करें ।
7.पांच तिथियों के दिन हरी—सब्जी, रात्रि भोजन एवं अब्रह्मचर्य का त्याग यदि भूल से टूटे तो दूसरे दिन उनका पालन करना तथा जान कर तोड़े गये हो तो एक—एक दिन के बदले तीन—तीन दिन उनका पालन करें ।
8.उपवास में भूल से कच्चा पानी पीया जाये तो तीन सामायिक करें ।
9.कच्चा पानी, हरी साग—सब्जी व रात्रि भोजन का यावज्जीवन के लिए त्याग हो और वह यदि जानकर तोड़ा गया हो तो एक तेला । इससे अधिक बार दोष लगा हो तो यथासंभव तपस्या बढ़ाएं ।
10.यावज्जीवन कुशील सेवन का त्याग हो, उसमें जितनी बार दोष लगे, उतनी ही बार एक—एक तेला करना चाहिए ।
11.प्रतिक्रमण का नियम हो और भूल से न कर पाये तो दूसरे दिन करें ।
12.प्रतिदिन 14 नियम चितारने का संकल्प हो और न चितार पायें तो एक दिन का एकाशन करें ।
13.किसी द्रव्य का जिस दिन त्याग हो और भूल से उस दिन वह खा लिया जाये तो दूसरे दिन न खायें या एक प्रहरसी करें ।
नोट : त्याग किया हुआ काम भूल से कर लें और फिर याद आ जाये तो दुबारा न दोहरायें । जैसे रात्रि भोजन का त्याग है, भूल से मुंह में सुपारी डाल ली हो तो याद आने पर तुरन्त निकाल दें ।
आचार्यश्री तुलसी