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श्रावक साधना

सोलह भावनाएं

अनित्य भावना

काल सामने है खड़ा, पंखी पर ज्यों बाज ।

रावण जैसे भूप का, उठा ले गया ताज ।।

अशरण भावना

रोग, शोक और मरण में, शरण बनेगा कौन ?

सारे साथी देखना, खड़े रहेंगे मौन ।।

संसार भावना

नाना योनि में लिया, जन्म अनन्ती बार ।

नरक—ताप, तिर्यंच में, कष्‍ट सहे अनपार ।।

एकत्व भावना

एकाकी नर जनमता, मरता है वह एक ।

कर्म अकेला भोगता, विकट कर्म की रेख ।

अनित्य भावना

पुत्र, मित्र कलत्र, धन, मान और अपमान ।

है आत्मा से भिन्‍न सब, फिर किसका अभिमान ।।

अशौच भावना

है शरीर मल—मूत्र से, भरा हुआ अत्यन्त ।

क्यों करते अनुराग तुम, कहते सारे संत ।।

आश्रव भावना

धागे से कपड़ा बने, मिट्टी से घर देख ।

कर्म—सूत्र से कर रहे, बन्धन जीव अनेक ।।

संवर भावना

कर्मों के आगमन को, संवर करता बंध ।

रोग—नाश करती दवा, त्यों संवर निर्द्वन्द्व ।।

निर्जरा भावना

संचित कर्म प्रभाव से, आत्मा बनी अशुद्ध ।

शुभ भावों के योग से, बन जाये अब शुद्ध ।।

धर्म भावना

नरक—कूप से जीव को, बाहर करता धर्म ।

राग, द्वेष जिसमें नहीं, यही धर्म का मर्म ।।

लोक भावना

लोक—पुरुष धर्मादि षट्—द्रव्यों का समवाय ।

कर्ता कोई है नहीं, शाश्‍वत इसका न्याय ।।

बोधि—दुर्लभ भावना

सम्यग् दर्शन रत्‍न की प्राप्ति दुर्लभ जान ।

महावीर की देशना, सुनने से कल्याण ।।

मैत्री भावना

जन—जन का उत्थान हो, भाव रहे दिन रात ।

शत्रु नहीं कोई यहां, सब हैं मेरे भ्रात ।।

प्रमोद भावना

देख सुखी संसार को, करे न मन में द्वेष ।

ईर्ष्यालु दुःखी सदा, नित्य भोगता क्लेश ।।

करुणा भावना

दीन दुःखी जन देखकर, जागे करुणा भाव ।

रोग, शोक से मुक्त हो, पार लगाये नाव ।।

मध्यस्थ भावना

सब मेरे अनुकूल हो, यह नहीं संभव बात ।

किन्तु रहूं मध्यस्थ मैं, होगा फल साक्षात ।।

रचयित्री : साध्वी राजीमती