तेरापंथ साधु-संघ की मौलिक मर्यादाएं
1.सर्व साधु—साध्वियां एक आचार्य की आज्ञा में रहें ।
2.विहार—चातुर्मास आचार्य की आज्ञा से करें ।
3.अपने शिष्य न बनाएं ।
4.आचार्य, योग्य व्यक्ति को ही दीक्षित करें । दीक्षित करने पर यदि कोई अयोग्य निकले तो उसे गण से अलग कर दें ।
5.आचार्य अपने गुरु भाई या शिष्य को उत्तराधिकारी चुने तो सब साधु—साध्वियां सहर्ष स्वीकार करें ।
6.श्रद्धा या आचार के बोल को लेकर गण में भेद न डालें । दलबन्दी न करें । आचार्य व बहुश्रुत साधु कहे वह मान लें अथवा केवली—गम्य कर दें ।
7.गण में शुद्ध साधुपन सरधे वह गण में रहें किन्तु छल—कपटपूर्वक गण में न रहें । जिसका मन साक्षी दे, भली—भांति साधुपन पलता जाने, गण में तथा अपने आपमें साधुपन माने तो गण में रहें किन्तु वंचना—पूर्वक गण में न रहे ।
8.गण में किसी साधु—साध्वी के प्रति अनास्था उपजे, शंका उपजे वैसी बात न करें ।
9.किसी साधु—साध्वी में दोष जान पड़े तो तत्काल उसे या आचार्य को जता दें, किन्तु उसका प्रचार न करें, दोषों को चुन—चुनकर इकट्ठा न करें ।
10.किसी साधु—साध्वी को जाति आदि को लेकर ओछी जबान न बोलें ।
11.गण के पुस्तक पन्नों आदि पर अपना अधिकार न करें ।
12.गण से बहिष्कृत या बहिर्भूत व्यक्ति से सम्पर्क न करें ।
13.पद के लिए उम्मीदवार न बनें ।