तेरापंथ की मौलिक मान्यताएं
1.दया और अहिंसा एक है । जीव जो अपने आयुष्य बल के आधार पर जीते हैं, वह दया या अहिंसा नहीं है । जो मरते हैं, वह हिंसा नहीं है । जो व्यक्ति जीवों को मारता है, वह हिंसक है और जो नहीं मारता, वह अहिंसक है ।
2.पुण्य का स्वतन्त्र बन्ध नहीं होता । पुण्य निर्जरा (धर्म) के साथ ही होता है ।
3.आचार्यश्री भिक्षु ने सभी सांसारिक कार्यों को एक ही दॄष्टि से नहीं देखा । उन्होंने कहा कुछ सांसारिक कार्य ऐसे होते हैं जो प्रत्यक्षतः बुरे होते हैं, निन्दनीय होते हैं । कुछ जिनका व्यवहार के धरातल पर मूल्य होता है, जो अच्छे होते हैं, प्रशंसनीय होते हैं ।
4.प्रत्येक व्यक्ति का धार्मिक आचरण अच्छा होता है । आचरण की अच्छाई और बुराई जाति विशेष या देश—विशेष से सम्बन्धित नहीं होती ।
5.दान देना मात्र धर्म नहीं है । जिस दान में राग—द्वेष नहीं, वही दान, धर्म कोटि का दान है । शेष दान व्यवहार कोटि का है ।
6.धर्म त्याग में है, भोग में नहीं ।
7.धर्म को खरीदा नहीं जा सकता । जहां धर्म का विनिमय होता है, वहां अध्यात्म धर्म नहीं होता, व्यवहार हो सकता है ।
8.लौकिक धर्म और लोकोत्तर धर्म को एक मानना भूल है ।
9.मिश्र—धर्म की मान्यता गलत है ।
10.बड़े जीवों की रक्षा के लिए छोटे जीवों को मारना अधर्म है, पाप है ।