अकम्पः संकल्पः क्वचिदपि न केनापि चलितः, न चित्ते चांचल्यं न च विपथगामीन्द्रियगणः । समं सोढा गालिः क्वचन घनमुष्टेः प्रहरणं, प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे ।।
तेरापंथ के आद्यप्रणेता आचार्य भिक्षु ढृढ़ संकल्प के धनी थे । कोई भी व्यक्ति उनके संकल्प को किसी भी परिस्थिति में प्रकम्पित नहीं कर सका । उनके चित्त में न किसी प्रकार की चंचलता थी और न इन्द्रियों की उत्पथगामिता । कहीं उनको गालियां मिलीं तो कहीं सघन मुष्टि का प्रहार । दोनों को उन्होंने समभावपूर्वक सहन किया । ऐसे निर्मलचेता भिक्षुस्वामी मेरे नयनों में अवतरित हो जायें—बस जायें ।