ॐ नमः अरिहंत अतनु, आचारज उवझाय । मुनी पंच परमेष्ठी नुं, ऊँकार रै मांय ।।
चौबीसी
बलि प्रणमूं गुणवंत गुरु, भिक्खू भरत मझार । दान दयादिक छाण नै, लीधो मारग सार ।।
भारीमाल पट भलकता, तीजै पट ऋषिराय । प्रणमूं मन वच काय करी, पांचू अंग नमाय ।।
सिध साधु प्रणमी करि, ऋषभादिक चौबीस । स्तवना करूं प्रमोद धरि, जय—जश कर जगदीश ।
मल्लि नेम ए दोय जिन, पाणिग्रहण न कीध । शेष बावीस जिनेसरू, रमण छांड व्रत लीध ।।
वासुपूज्य मल्लि नेम जिन, पार्श्व अनै वर्धमान । कुमर पदे अरु प्रथम वय, धार्यो चरण—निधान ।।
छत्रपती उगणीस जिन, व्रत तीजी वय सार । उत्कृष्ट आयुजिह समय, तमु त्रिण भाग विचार ।।
वीर समय उत्कृष्ट स्थिति, वर्ष सवा सय सोय । भाग तीन कीजै तसु, ए तीनूं वय जोय ।।
इम सगलै उत्कृष्ट स्थिति, त्रिणभागे वय तीन । अंतिम वय उगणीस जिन, धुर वय पंच सुचीन ।।
श्वेतवरण चंद सुविधि जिन, पद्म वासुपूज्य लाल । मुनि सुव्रत रिठनेम प्रभु, कृष्ण वरण सुविशाल ।।
मल्लिनाथ फुन पार्श्व प्रभु, नील वरण वर अंग । षोडस शेष जिनेश तनु, सोवन वरण सुचंग ।
श्रेयांस मल्ली सुव्रत जिन, नेम पार्श्व जगदीश । प्रथम प्रहर दीक्षा ग्रही, पाछिल पहर उगणीस ।।
सुमति जीम दीक्षा ग्रही, अठम—भक्त मल्लि पास । छट्ठ—भक्त जिन वीस वर, वासुपूज्य उपवास ।।
ऋषभ अष्टापद शिव गमन, वीर पावापुरी दीस । नेम गिरनारे, वासु चंपा, शिखर—समेत सुबीस ।।
ऋषभ संथारे शिव—गमन, चउदस—भक्त उदार । चरम छठ्ठ अणसण पवर, बावीस मास—संथार ।।
ऋषभ वीर अरु नेम जिन, पल्यंकासन पेख । शेष इक्कीस जिनेसरू, काउसग—मुद्रा देख ।
जिन चौबीस तणां सुगुण, रचियै वचन रसाल । ध्यान सुधावर सार रस, ‘जय—जश’ करण विशाल ।। आदिनाथ स्तवन प्रणमूं प्रथम जिनन्द नैं जय जय जिन चंदा
वन्दू बेकर जोड़ नैं, जुग आदि जिनिन्दा । कर्म—रिपु—गज ऊपरै, मृगराज मुनिन्दा ।।
अनुकूल प्रतिकूल सम सही, तप विविध तपंदा । चेतन तन भिन लेखवी, ध्यान शुकल ध्यावंदा ।।
पुद्गल—सुख अरि पेखिया, दुख—हेतु भयाला । विरक्त चित विघट्यो इसो, जाण्या प्रत्यक्ष जाला ।
संवेग—सरवर झूलता, उपशम—रस लीना । निंदा—स्तुति सुख—दु:ख में, समभाव सुचीना ।।
वासी चंदन समपणें, थिर—चित्त जिन ध्याया । इम तन—सार तजी करी, प्रभु केवल पाया ।
हूं बलिहारी तांहरी वाह ! वाह ! ! जिनराया । उवा दिशा किण दिन आवसी, मुझ मन ऊम्हाया ।
उगणीसै सुदि भाद्रवे, दशमी दीतवारं । ऋषभदेव रटवै करी, हुओ हरष अपारं ।। लय : ऐसे गुरु किम पाइयै अजितप्रभु स्तवन अहो प्रभु ! तुम ही दायक शिव-पंथ ना ।
अहो प्रभु ! अजित जिनेश्वर आपरो, ध्याऊं ध्यान हमेश हो । अहो प्रभु ! अशरण शरण तूं ही सही, मेटण सकल कलेश हो ।।
अहो प्रभु ! उपशम रस भरि आपरी, वाणी सरस विशाल हो । अहो प्रभु ! मुगति-निसरणी मनोहरू, सुण्यां मिटै भ्रम जाल हो ।।
अहो प्रभु ! उभय बंधण आप आखिया, राग-द्वेष विकराल हो । अहो प्रभु ! हेतु ए नरक निगोद नां, राच्या मूरख बाल हो ।।
अहो प्रभु ! रमणी राखसणी कही, विषबेली मोहजाल हो । अहो प्रभु ! काम-भोग किम्पाक-सा, दाख्या दीन-दयाल हो ।।
अहो प्रभु ! विविध उपदेश देई करी, ते तार्या नरनार हो । अहो प्रभु ! भव-सिन्धु-पोत तू ही सही, तू ही जगत-आधार हो ।।
अहो प्रभु ! शरण आयो तुझ साहिबा ! बस रह्या हीया मांय हो । अहो प्रभु ! आगम—वयण अङ्गीकरी, रह्यो ध्यान तुझ ध्याय हो ।।
अहो प्रभु ! संवत उगणीसै भाद्रवै, दसमी आदितवार हो । अहो प्रभु ! आप तणा गुण गाविया, वर्त्या जै जै कार हो ।। लय : अहो प्रिय तुम बाट पाड़ी संभव प्रभु स्तवन संभव साहिब समरियै ।
संभव साहिब समरियै, ध्यायो है जिन निर्मल ध्यान कै । एक पुद्गल दृष्टि थाप नै, कीधो है मन मेर समान कै ।।
तन—चंचलता मेट नै, हुआ है जग थी उदासीन कै । धर्म शुकल थिर—चित्त धरै, उपशम—रस में होय रह्या लीन कै ।।
सुख इन्द्रादिक नां सहु, जाण्या है प्रभु अनित्य असार कै । भोग भयंकर कटुक—फल, देख्या है दुर्गति दातार कै ।।
सुधा संवेग—रसे भर्या, पेख्या है पुद्गल मोह पास कै । अरुचि अनादर आण नैं, आतम ध्याने करता विलास कै ।।
संग छांड मन वश करी, इन्द्रिय—दमन करी दुर्दन्त कै । विविध तपे करी स्वामजी, घाति—करम नौं कीधो अंत कै ।।
हूँ तुझ शरणे आवियो, कर्म—विदारण तू प्रभु ! वीर कै । तें तन मन वच बस किया, दु:कर करणि करण महाधीर कै ।।
संवत उगणीसै भाद्रवै, सुदि इग्यारस आण विनोद कै । संभव साहिब समरिया, पाम्यो है मन अधिक प्रमोद कै ।। लय : हूँ बलिहारी हो जादवां अभिनन्दन प्रभु स्तवन अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।
तीर्थंकर हो चोथा जग भाण, छांड गृहवास करी मति निरमली । विषय—विटंबण हो तजिया विष फल जाण ।।
दु:कर करणी हो कीधी आप दयाल, ध्यान सुधारस सम दम मन गली । संग त्याग्यो हो जाणी माया—जाल ।।
वीर रसे करी हो कीधी तपस्या विशाल, अनित्य अशरण—भावन अशुभ निरदली । जग झूठो हो जाण्यो आप कृपाल ।।
आतम मिंत्री हो सुखदाता सम परिणाम, एहिज अमित्र अशुभ भावे कलकली । एहवी भावन हो भाई जिन गुण—धाम ।।
लीन संवेगे हो ध्यायो शुकल ध्यान, क्षायक—श्रेणि चढी हुवा केवली । प्रभु पाम्या हो निरावरण सुज्ञान ।।
उपशम—रस नीं हो बागरी प्रभु बाण, तन मन प्रेम पाया जन सांभली । तुम वच धारी हो पाम्या परम कल्याण ।।
जिन अभिनंदण हो गाया तन मन प्यार, संवत उगणीसै भाद्रवै अघ दली । सुदि इग्यारस हो हुवो हर्ष अपार ।। लय : सती कलूजी हो थाया संजम नै त्यार सुमति प्रभु स्तवन सुमति जिनेश्वर साहिब शोभता ।
सुमति जिनेश्वर साहिब शोभता, सुमति करण संसार । सुमति जप्यां थी सुमति बधै घणी, सुमति सुमति—दातार ।।
ध्यान सुधारस निरमल ध्याय नैं, पाम्या केवल नाण । बाण सरस वर जन बहु तारिया, तिमिर हरण जगभाण ।।
फटिक—सिंहासण जिनजी फाबता, तरु अशोक उदार । छत्र चमर भामंडल भलकतो, सुर—दुन्दुभि झिणकार ।
पुष्प—वृष्टि दिव्य—ध्वनि दीपती, साहिब जग सिणगार । अनंत ज्ञान दर्शन बल चरण ही, द्वादश गुण श्रीकार ।।
वाण अमी सम उपशम—रस भरी, दुर्गति—मूल कषाय । शिव—सुख नां अरि शब्दादिक कह्या, जग—तारक जिनराय ।।
अंतरयामी शरणै आपरै, हूँ आयो अवधार । जाप तुमारो निश—दिन संमरू, शरणागत सुखकार ।
संवत उगणीसै सुदि पख भाद्रवै, बारस मंगलवार । सुमति जिनेश्वर तन मन स्यूं रट्या, आनंद उपनो अपार ।। लय : मूरख जीवड़ा रे गाफल मत रहे पद्म प्रभु स्तवन पदम प्रभू नित समरियै ।
निर्लेप पदम जिसा प्रभू, प्रभु पद्म पिछाण । संयम लीधो तिण समै, पाया चोथो नाण ।।
ध्यान शुकल प्रभु ध्याय नैं, पाया केवल सोय । दीनदयाल तणी दशा, कैणी नावै कोय ।।
सम दम उपशम रस भरी, प्रभु ! आपरी वाण । त्रिभुवन तिलक तूं ही सही, तूं ही जनक समान ।।
तू प्रभु कल्पतरू जिसो, तूं चिंतामणि जोय । समरण करतां आपरो, मन—वंछित होय ।।
सुखदायक सहु जग भणी, तूं ही दीनदयाल । शरण आयो तुझ साहिबा ! तूं ही परम कृपाल ।
गुण गातां मन गह—गहै, सुख संपति जाण । विघन मिटै समरण कियां, पामैं परम कल्याण ।
उगणीसै नैं भाद्रवै, सुदि बारस देख । पद्म प्रभू रट्या लाडनूं, हुओ हरष विशेष । लय : कुशलपुरी में प्रभु जनमिया सुपार्श्वप्रभु स्तवन भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।
सुपास सातमां जिणंद ए, ज्यांनै सेवै सुर नर वृंद ए । सेवक पूरण आश ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।
जन प्रतिबोधण काम ए, प्रभु बागरे वाण अमाम ए । संसार स्यूं हुवै उदास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।
पामैं कामभोग थी उद्वेग ए, बलि उपजै परम संवेग ए । एहवा तुम वच सरस विलास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।
घणी मीठी चक्री नीं खीर ए, बलि खीर—समुद्र नो नीर ए । एहथी तुम वच अधिक विमास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।
सांभल नै जनव्रन्द ए, रोम—रोम में पामै आनंद ए । ज्यांरी मिटै नरकादिक त्रास ए, भजिये नित्य स्वामी सुपास ए ।।
तू प्रभू ! दीन—दयाल ए, तूं ही अशरण—शरण निहाल ए । हूं छूं तुम्हारो दास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।
संवत उगणीसै सोय ए, भाद्रवा सुदि तेरस जोय ए । पहुंची मन नीं आश ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। लय : कृपण दीन अनाथ ए चन्द्रप्रभु स्तवन प्रभु ! चन्द्र जिनेश्वर ! चन्द जिसा ।
हो प्रभु ! चंद जिनेश्वर चंद जिसा, वाणी शीतल चंद सीन्हाल हो । प्रभु ! उपशम रस जन सांभल्यां, मिटै करम भरम मोह जाल हो ।।
हो प्रभु ! सूरत मुद्रा सोहनी, वारु रूप अनूप विशाल हो । प्रभु ! इंद्र शची जिन निरखता, ते तो तृप्त न होवै निहाल हो ।।
अहो ! वीतराग प्रभु तूं सही, तुम ध्यान ध्यावै चित रोक हो । प्रभु ! तुम तुल्य ते हुवै ध्यान सूं, मन पायां परम संतोष हो ।।
हो प्रभु ! लीनपणे तुम ध्यावियां, पामै इंद्रादिक नीं ऋद्धि हो । बलि विविध भोग सुख संपदा, लहै आमोसही आदि लब्धि हो ।।
हो प्रभु ! नरेंद्र पद पामै सही, चरण सहित ध्यान तन मन्न हो । प्रभु ! अहमिंद्र पद पामै बलि, कियां निश्चल थारो भजन्न हो ।।
हो प्रभु ! शरण आयो तुझ साहिबा, तुम ध्यान धरूं दिन—रैन हो । तुझ मिलवा मुझ मन उमह्यो, तुम समरण स्यूं सुख चैन हो ।।
हो प्रभु ! संवत उगणीसै नैं भाद्रवै, सुदि तेरस नैं बुधवार हो । प्रभु ! चंद जिनेश्वर समरिया, हुओ आनन्द हरष अपार हो ।। लय : शिवपुर नगर सुहामणो सुविधि प्रभु स्तवन सुविधि भजियै शिरनामी हो ।
सुविधि करि भजियै सदा, सुविधि जिनेश्वर स्वामी हो । पुष्पदंत नाम दूसरो, प्रभु अंतरयामी हो ।।
श्वेत वरण प्रभु शोभता, वारू वाण अमामी हो । उपशम रस गुण आगली, मेटण भव भव खामी हो ।।
समवसरण बिच फाबता, त्रिभुवन—तिलक तमामी हो । इंद्र थकी ओपै घणां, शिव—दायक स्वामी हो ।।
सुरेंद्र नरेन्द्र चन्द्र ते, इंद्राणी अभिरामी हो । निरख—निरख धापै नहीं, एहवो रूप अमामी हो ।।
मधुकर मरंद तणी परै, सुर नर करत सलामी हो । तो पिण राग व्यापै नहीं, जीत्यो मोह हरामी हो ।।
जे जोधा जग में घणां, सिंह साथे संग्रामी हो । तैं मन इन्द्री वश करी, जोड़ी केवल पामी हो ।।
उगणीसै पूनम भाद्रवी, प्रणमूं शिरनामी हो । मन—चिंतित वस्तु मिलै, रटियां जिन स्वामी हो ।। लय : सोही तेरापंथ पावै हो शीतल प्रभु स्तवन सूरत थारी मन बसै साहिब जी !
शीतल जिन शिवदायका साहिब जी ! शीतल चन्द समान हो, निसनेही । शीतल अमृत सारिषा साहिब जी ! तप्त मिटै तुम ध्यान हो, निसनेही ।।
वंदै निंदै तो भणी साहिब जी ! राग द्वेष नहीं ताम हो, निसनेही । मोह—दावानल मेटियो साहिब जी ! गुण—निप्पन तुम नाम हो, निसनेही ।।
नृत्य करै तुझ आगलै साहिब जी ! इंद्राणी सुर—नार हो, निसनेही । राग भाव नहिं ऊपजै साहिब जी ! अंतर तप्त निवार हो, निसनेही ।।
क्रोध मान माया लोभ ए साहिब जी ! अग्नि सूं अधिकी आग हो, निसनेही । शुकल ध्यान रूप जल करी साहिब जी ! थया शीतलीभूत महाभाग हो, निसनेही ।।
इन्द्रिय नोइन्द्रिय आकरा साहिब जी ! दुर्जय नैं दुर्दान्त हो, निसनेही । तैं जीत्या मन थिर करी साहिब जी ! धर उपशम चित शांत हो, निसनेही ।।
अंतरजामी ! आपरो साहिब जी ! ध्यान धरूं दिन—रैन हो, निसनेही । उवाही दशा कद आवसी साहिब जी ! होसी उत्कृष्टो चैन हो, निसनेही ।।
उगणीसै पूनम भाद्रवी साहिब जी ! शीतल मिलवा काज हो, निसनेही । शीतल जिनजी नैं समरिया साहिब जी ! हिय शीतल हुवो आज हो, निसनेही ।। लय : हूं देवा आई ओलभड़ा सासूजी श्रेयांस प्रभु स्तवन श्रेयांस जिनेश्वरू ! प्रणमूं नित बेकर जोड़ रे ।
मोक्ष मार्ग श्रेय शोभता, धार्या स्वाम श्रेयांस उदार रे । जे जे श्रेय वस्तु संसार में, ते ते आप करी अंगीकार रे । ते ते आप करी अंगीकार, श्रेयांस जिनेश्वरू ?.... ।।
समिति गुप्ति दुर्धर घणां, धर्म शुकल ध्यान उदार रे । ए श्रेय वस्तु शिवदायिनी, आप आदरी हरष अपार रे ।।
तन चंचलता मेट नैं, पद्मासन आप विराज रे । उत्कृष्ट ध्यान तणो कियो, आलंबन श्री जिनराज रे ।।
इंद्रिय विषय विकार थी, नरकादिक रुलियो जीव रे । किंपाक फल नीं ओपमा, रहिये दूर थी दूर सदीव रे ।।
संजम तप जप शील ए, शिव—साधन महा सुखकार रे । अनित्य अशरण अनंत ए, ध्यायो निर्मल ध्यान उदार रे ।।
त्रीयादिक नां संग ते, आलंबन दुख दातार रे । अशुद्ध आलंबन छांड नैं, धार्यो ध्यान आलंबन सार रे ।।
शरण आयो तुझ साहिबा, करूं बार—बार नमस्कार रे । उगणीसै पूनम भाद्रवी, मुझ वरत्या जै जै कार रे ।। लय : पुत्र वसुदेव रा गजसुखमाल वासुपूज्य प्रभु स्तवन प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी !
द्वादशमा जिनवर भजियै, राग द्वेष मच्छर माया तजिये । प्रभु लाल वरण तन छिब जाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।
वनिता जाणी वेतरणी, शिव—सुंदर वरवा हूंस घणी । काम—भोग तज्या किम्पाकाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।
अंजन—मंजन स्यूं अलगा, बलि पुष्प विलेपन नहिं बिलगा । कर्म काट्या ध्यान—मुद्रा ठाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।
इन्द्र थकी अधिका ओपै, करुणागर कदेय नहीं कोपै । वर साकर दूध जिसी वाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।
स्त्री स्नेह पासा दुर्दन्ता, कह्या नरक निगोद तणां पंथा । इह भव पर भव दुखदाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।
गज कुंभ दलै मृगराज—हणी, पिण दोहिली निज आतम दमणी । इम सुण बहु जीव चेत्या जाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।।
भाद्रवी पूनम उगणीसो, कर जोड़ नमूं वासुपूज्य ईसो । प्रभु गातां रोम—राय हुलसाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।। लय : नित जाप जपो श्री नवकारं विमल प्रभु स्तवन साहिब ! शरण तिहारै हो । शरण तिहारै, शरण तिहारै, शरण तिहारै हो । विमल प्रभु ! सेवक नीं अरदास, आयो शरण तिहारै हो ।
विमल करण प्रभु विमलनाथजी, विमल आप वर रीत । विमल ध्यान धरतां हुवै निर्मल, तन मन लागी प्रीत ।
विमल ध्यान प्रभु आप ध्याया, तिण यूं हुवा विमल जगदीश । विमल ध्यान बलि जे कोई ध्यासी, होसी विमल सरीस ।।
विमल गृहवासे द्रव्य जिनेन्द्र था, दीख्या लीधां भावे साथ । केवल उपनां भावे जिनेश्वर, भावे विमल आराध ।
नाम स्थापना द्रव्य विमल थी, कारज न सरै कोय । | भाव विमल थी कारज सुधरै, भाव जप्यां शिव होय ।।
गुण गिरवो गंभीर धीर तूं, तूं मेटण जम—त्रास । मैं तुम वयण आगम शिर धार्या, तूं मुझ पूरण आश ।
तूं ही कृपाल दयाल साहिब ! शिव—दायक तूं जगनाथ । निश्चल ध्यान धरै तुझ ओलख, ते मिलै तुझ संघात ।।
अंतरजामी आप उजागर, मैं तुम शरण लीध । संवत उगणीसै भाद्रवी पूनम, वंछित कारज सीध ।। लय : कांय न मांगा, कांय न मांगों, कांय न मांगा हो अनन्त प्रभु स्तवन पायो पद जिनराज नौं सुध ध्यान निर्मल ध्याय भला जी कांईं ।।
अनंत नाम—जिन चवदमां रे, द्रव्य चौथे गुणठाण । भावे जिन हुवै तेरमे रे, इतलै द्रव्य जिन जाण ।।
जिन चक्री सुर जुगलिया रे, वासुदेव बलदेव । पंचम गुण पावै नहीं रे, ए रीत अनादि स्वमेव ।।
संजम लीधौ तिण समैं रे, आया सप्तम गुणठाण । अंतरमुहूर्त तिहां रही रे, छठे बहुस्थिति जाण ।।
आठमा थी दोय श्रेणि छै रे, उपशम क्षपक पिछाण । उपशम जाय इग्यारमे रे, मोह दबावतो जाण ।।
श्रेणि उपशम जिन नां लहै रे, खपक श्रेणि धर खंत । चारित्र मोह खपावतां रे, चढ़िया ध्यान अत्यंत ।।
नवमे आदि संजल चिहुं रे, अन्त समे इक लोभ । दसमे सूक्षम मात्र ते रे, सागार उपयोग सोभ ।।
एकादशम उलंघ नै रे, बारमे मोह खपाय । त्रिकर्म इक सम तोड़तां रे, तेरम केवल पाय ।।
तीर्थ थाप जोग रुंध नै रे, चवदमां थी शिव पाय । उगणीसै पूनम भाद्रवी रे, अनन्त रट्या हरषाय ।। लय : पायो जुगराज पद मुनि धर्म प्रभु स्तवन अहो प्रभु परम देव प्यारा ।
धर्म जिन धर्म तणा धोरी, त्रटक मोह—पाश नाख्या तोड़ी । चरण—धर्म आतम सूं जोड़ी, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।
शुकल ध्यानामृत रस लीना, संवेग रसे करि जिन भीना । प्याला प्रभु उपशम नां पीना, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।
जाण्या शब्दादिक मोहजाला, रमणि—सुख किंपाक सम काला । हेतु नरकादिक दुख आला, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।
पुद्गल सुख अरि जाण्या स्वामी, ध्याने थिरचित आतम—धामी । जोड़ी युग केवल नीं पामी, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।
थाप्या प्रभु च्यार तीरथ तायो, आख्यो धर्म जिन आज्ञा मांह्यो । आज्ञा बारै अधरम दुखदायो, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।
विरत धर्म धर्म—जिनंद ख्याता, अव्रत कही अधरम दुख दाता । सावद निरवद जू जूआ कह्या खाता, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।
बहुजन तार मुक्ति पाया, उगणीसै आसू धुर दिन आया । धर्म जिन रटवै सुख पाया, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।। लय : भीखू पट भारीमाल भलकै शान्ति प्रभु स्तवन बलिहारी हो शांति जिणंद की ।
शांति करण प्रभु शांतिनाथजी, शिवदायक सुखकंद की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।
अमृत—वाण सुधा—सी अनुपम, मेटण मिथ्या मंद की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।
काम भोग राग द्वेष कटुक फल, विष—बेली मोह—धंध की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।
राखसणी रमणी वैतरणी, पुतली अशुचि दुर्गन्ध की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।
विविध उपदेश देई जन तार्या, हूं वारि जाऊं विश्वनंद की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।
परम दयाल गोवाल कृपानिधि, तुम जप माला आनंद की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।।
संवत उगणीसै आसू बिद एकम, शांति—लता सुखकंद की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।। लय : हूं बलिहारी भीखणजी साध री कुन्थु प्रभु स्तवन प्रभु को समरण कर नीको रे ।
कुन्थु जिनेश्वर करुणा—सागर, त्रिभुवन सिर टीको रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।।
अद्भुत रूप अनूप कुन्थु जिन, दर्शन जग—पी को रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।।
वाण सुधा सम उपशम रस नीं, वाल्हौ जगती को रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।।
अनुकंपा दोय श्री जिन दाखी, मर्म समदृष्टी को रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।।
असंजती रो जीवणो बांछै, सावद्य तहतीको रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।।
निरवद्य करुणा करि जन तार्या, धर्म ए जिनजी को रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।।
संवत उगणीसै आसू बिद एकम, शरणो साहिबजी को रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।। लय : भिक्षु म्हारै प्रगट्या जी भरत खेतर में अर प्रभु स्तवन मोनैं प्यारा लागै छै जी अर जिनराज । मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।
अर जिन कर्म—अरी नां हंता, जगत उधारण ज्हाज । मोनें वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।
परीषह उपसर्ग रूप अरी हण, पाया केवल पाज । मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।
नैण न धापै निरखतांजी, इन्द्राणी सुरराज । मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।
वारु रे जिनेश्वर रूप अनूपम, तू सुगणा—सिरताज । मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।
वाण विशाल दयाल—पुरुष नीं, भूख तृषा जाए भाज । मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।
शरणै आयो स्वाम रै जी, अविचल सुख नै काज । मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।।
उगणीसै आसू बिद एकम, आणन्द उपनौं आज । मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।। लय : देखो सहियां ! बनड़ो ए नेमकुमार मल्ली प्रभु स्तवन मल्लि जिनेश्वर नाम समर तरण शरण आयो ।
नील वर्ण मल्लि जिनेश्वर, ध्यान—निर्मल ध्यायो । अल्प काल मांहि प्रभू, परम—ज्ञान पायो ।।
कल्प पुष्पमाल जेम, सुगंध तन सुहायो । सुर—वधू वर नयन—भ्रमर, अधिक ही लिपटायो ।।
स्व पर चक्र विविध विघन, मिटत तो पसायो । सिंघनाद थकी गजेन्द्र, जेम दूर जायो ।।
वाण विमल निमल—सुधा—रस संवेग छायो । नर सुरासुर तिरि समाज, सुणत ही हरषायो ।
जगदयाल तू हि कृपाल, जनक ज्यूं सुखदायो । वच्छल नाथ स्वाम साहिब, सुजश तिलक पायो ।।
जपत जाप खपत पाप, तपत ही मिटायो । मल्लिदेव त्रिविध सेव, जग अछेरो पायो ।।
उगणीसै आसोज कृष्ण, तीज सुदिन आयो । कुम्भ—नन्द कर आनन्द, हरष थी मैं गायो ।। लय : जै गणेश, जै गणेश, जै गणेश.... मुनिसुव्रत प्रभु स्तवन प्रभूजी ! आप प्रबल बड़ भागी । त्रिभुवन दीपक सागी रा ।।
सुमित्रनन्दन श्री मुनिसुव्रत, जगतनाथ जिन जाणी । चारित्र ले केवल उपजायो, उपशम रस नीं वाणी रा ।।
चौतीस अतिशय पैंतीस वाणी, निरखत सुर इन्द्राणी । संवेग रस नीं वाणी सांभल, हरष स्यूं आंख्यां भराणी रा ।।
शब्द-रूप-रस-गंध-परस, प्रतिकूल न हुवै तुम आगै । पंच दरशन थांस्यूं पग नहिं मांडै, (तिम) अशुभ शब्दादिक भागै रा ।।
सुर कृत जल स्थल पुष्प पुंजवर, ते छांडी चित दीनो । तुझ निश्वास-सुगंध मुख-परिमल, मन-भ्रमर महा लीनो रा ।।
पंचेन्द्री सुर नर तिरि तुम स्यूं, किम होवै दुखदायो । एकेन्द्री अनिल तजै प्रतिकूलपणुं, बाजै गमतो वायो रा ।।
रागद्वेष दुर्दत तै दमिया, जीत्या विषय विकारो । दीनदयाल आयो तुम सरणै, तूं गति-मति-दातारो रा ।।
उगणीसै आसोज तीज तिथि, श्री मुनिसुव्रत गाया । लाडनूं शहर मांहि रूड़ि रीते, आणंद अधिको पाया रा ।। लय : भरतजी भूप भया छो नमि प्रभु स्तवन प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे । मुझ प्यारा प्राण आधारा ।।
नमिनाथ अनाथां रा नाथो रे, नित्य नमण करू जोड़ी हाथो रे । कर्म काटण वीर विख्यातो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।
प्रभु ध्यान सुधारस ध्याया रे, पद केवल जोड़ी पाया रे । गुण उत्तम-उत्तम आया, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।
प्रभु बागरी वाण विशालो रे, खीर-समुद्र थी अधिक रसालो रे । जगतारक दीनदयालो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।
थाप्या तीरथ च्यार जिनीन्दो रे, मिथ्या-तम हरण मुनीन्दो रे । ज्यांनैं सेवत सुर—नर वृन्दो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।
सुर अनुत्तर विमाण नां सेवै रे, प्रश्न पूछयां उत्तर जिन देवै रे । अवधिज्ञान करी जाण लेवै, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।
तिहां बैठा ते तुम ध्यान ध्यावै रे, तुम योग—मुद्रा चित चावै रे । ते पिण आपरी भावना भावै, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।।
उगणीसै आसोज उदारो रे, कृष्ण चौथ गाया गुणधारो रे । हुवो आणंद हर्ष अपारो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।। लय : परमगुरु पूज्यजी मुझ प्यारा रे अरिष्टनेमि प्रभु स्तवन प्रभु नेम स्वामी ! तू जगनाथ अंतरयामी । रिठनेम स्वामी ! तू जगनाथ अंतरयामी ।।
तूं तोरण स्यू फिर्यो जिन—स्वाम, अद्भुत बात करी तें अमाम । प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।
राजिमती छांडी जिनराय, शिव—सुन्दर स्यूं प्रीत लगाय । प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।
केवल पाया ध्यान वर ध्याय, इन्द्र शची निरखै हरषाय । प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।
नेरिया पिण पामैं मन मोद, तुझ कल्याण सुर करत विनोद । प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।
राग—रहित शिव सुख स्यूं प्रीत, कर्म हणै बलि द्वेष रहीत । प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।
इचरजकारी थारो चरित्त, हूं प्रणमूं कर जोड़ी नित्त । प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।।
उगणीसै बिद चौथ कुमार, नेम जप्यां पायो सुखसार । प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।। लय : व्रजवासी लाला कान पार्श्वनाथ प्रभु स्तवन पारस देव ! तुम्हारा दर्शन भाग भला सोई पावै हो । भाग भला सोई पावै, हूं वारि जाऊं, जीव मगन हो ज्यावै हो पारस देव !
लोह कंचन करै पारस काचो, ते कहो कर कुण लेवै हो । पारस तू प्रभु साचो पारस, आप समो कर देवै हो ।।
तुझ मुख—कमल पासै चमरावलि, चन्द्रकांतिवत सोहै हो । हंस—श्रेणि जाणै पंकज सेवे, देखत जन—मन मोह हो ।।
फटिक—सिंहासण सिंह आकारे, बैस देशना देवै हो । वन—मृग आवै वाणी सुणवा, जाणक सिंह ने सेवै हो ।।
चन्द्र समो तुझ मुख महा शीतल, नयन—चकोर लुभावै हो । इन्द्र नरेन्द्र सुरासुर रमणी, निरखत तृप्ति न पावै हो ।।
पाखंडी सरागी आप विरागी, आपस में इम गैरी हो । वैर भाव पाखंडी राखै, आप त्यांरा नहिं वैरी हो ।।
जिम सूरज खद्योत ऊपरै, वैर—भाव नहिं आणै हो । इण विध प्रभु पिण पाखंडियां नैं, खद्योत सरीखा जाणै हो ।।
परमदयाल कृपाल पारस प्रभु, संवत उगणीसै गाया हो । कृष्ण पक्ष तिथि चौथ लाडनूं, आणंद अधिको पाया हो ।। लय : पूज भीखणजी तुम्हारा दर्शन महावीर प्रभु स्तवन नहीं इसो दूसरो जगवीर, उपसर्ग सहिवा अडिग जिनवर, सुरगिरि जेम सधीर ।
चरम जिनेन्द्र चौबीसमा रे, अघ हणवा महावीर । विकट तप वर ध्यान धर प्रभु, पाया भव जल तीर ।।
संगम दुख दिया आकरा पिण, सुप्रसन्न निजर दयाल । जग उद्धार हुवै मो थकी रे, ए डूबे इण काल ।।
लोक अनारज बहु किया रे, उपसर्ग विविध प्रकार । ध्यान सुधारस लीनता जिन, मन में हरष अपार ।।
इण पर कर्म खपाय नै प्रभु, पाया केवल नाण । उपशम रसमय वागरी रे, अधिक अनूपम वाण ।।
पुद्गल सुख अरि शिव तणां रे, नरक तणा दातार । छांड रमण किंपाक बेली, संवेग संजम धार ।।
निंदा नैं स्तुति समपणै रे, मान अनै अपमान । हरष शोग मोह परहर्यां रे, पामै पद निरवाण ।।
इम बहुजन प्रभु तारिया रे, प्रणमूं चरम जिणंद । उगणीसै आसोज चौथ बिद, हुओ अधिक आणंद ।। लय : पोढ़ो प्रभु द्वारिका