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चौबीसी – ॐ नमः अरिहंत अतनु

चौबीसी – भक्ति और वैराग्यरस से परिपूर्ण रचना है। इसमें स्तुति के माध्यम से अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों का प्रतिपादन हुआ है। जयाचार्य ने अपने अनुभवों के स्तर पर ध्यान के मूलभूत तत्त्वों को प्रस्तुत किया है। जैन-परम्परा में साधना के तीन मार्ग हैं- ज्ञान, दर्शन और चारित्र। इनमें स्तुति या भक्ति का निर्देश नहीं है। इस त्रिवेणी में शुद्ध आध्यात्मिक अनुभव की बात आती है। भक्ति भी आध्यात्मिक चेतना का स्फुरण है। वह चारित्र का एक अंग है। इसलिए जैन-परम्परा में भक्ति के लिए अवकाश नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। चौबीसी में चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति की गई है। प्रस्तुत कृति स्तुति-प्रधान है, इस दृष्टि से इसे भक्ति-मार्ग की धारा में सम्मिलित किया जा सकता है।

आचार्य श्री जीतमलजी (श्रीमद जयाचार्य)

1

ॐ नमः अरिहंत अतनु, आचारज उवझाय। मुनी पंच परमेष्ठि ए, ॐ कार रै मांय।।

मैं ॐ को नमस्कार करता हूँ। अर्हत्, अतनु – सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और मुनि, ये पांच परमेष्ठी उस ओमकार में समाविष्ट हैं।

2

बलि प्रणमूं गुणवंत गुरु, भिक्खू भरत मझार। दान दयादिक छाण नै, लीधो मारग सार।।

मैं अपने गुण-सम्पन्न गुरु भिक्षु को प्रणाम करता हूँ। उन्होंने इस भारत-भूमि में दान, दया आदि तत्त्वों का निचोड़ करके सारभूत साधना-मार्ग को प्राप्त किया।

3

भारीमाल पट भलकता, तीजै पट ऋषिराय। प्रणमूं मन वच काय करी, पांचूं अंग नमाय।।

उनके देदीप्यमान पटधर भारीमालजी और तीसरे पटधर ऋषिरायजी को भी मैं मन, वचन एवं काया एकाग्र कर पांचों अंग नमा प्रणाम करता हूँ।

4

सिध साधु प्रणमी करि, ऋषभादिक चौबीस। स्तवना करूं प्रमोद धरि, जय-जश कर जगदीश।।

सिद्धों और साधुओं को प्रणाम कर मैं प्रमुदित भाव से ऋषभ आदि चौबीस अर्हतों की स्तवना (चौबीसी की रचना) करता हूँ। वे सभी अर्हत् जगदीश्वर हैं और जय एवं यश के दायक हैं।

5

मल्लि नेम ए दोय जिन, पाणिग्रहण न कीध। शेष बावीस जिनेसरू, रमण छांड व्रत लीध।।

मल्लि और नेमि इन दोनों ने विवाह नहीं किया। शेष बाईस अर्हत् अपनी रमणियों को छोड़कर प्रव्रजित हुए।

6

वासुपूज्य मल्लि नेम जिन, पार्श्व अनै वर्धमान। कुमर पदे अरु प्रथम वय, धार्यो चरण-निधान।।

वासुपूज्य, मल्लि, नेमि, पार्श्व और वर्धमान ने कुमारपद एवं प्रथम वय में संयम-रूप निधि का वरण किया है।

7

छत्रपती उगणीस जिन, व्रत तीजी वय सार। उत्कृष्ट आयु जिह समय, तसु त्रिण भाग विचार।।

शेष उन्नीस अर्हतों ने राज्यपद पर अभिषिक्त हो, तीसरी वय में दीक्षा स्वीकार की। जिस युग में सामान्यतः जितना आयुष्य होता है उसके तीन भाग तीन वय के रूप में निरूपित हैं।

8

वीर समय उत्कृष्ट स्थिति, वर्ष सवा सय होय। भाग तीन कीजै तसु, ए तीनूं वय जोय।।

भगवान महावीर के युग में सामान्यतः अधिकतम आयुष्य सवा सौ वर्ष का होता था। उसके तीन भाग किये जाने पर प्रत्येक वय 41 वर्ष और 8 मास की होती है।

9

इम सगलै उत्कृष्ट स्थिति, त्रिणभागे वय तीन। अंतिम वय उगणीस जिन, धुर वय पंच सुचीन।।

इस प्रकार सर्वत्र उत्कृष्ट स्थिति के तीन भाग तीन वय के रूप में सम्मत हैं। इस क्रम से उन्नीस अर्हतों ने अंतिम वय में और पांच अर्हतों ने प्रथम वय में दीक्षा स्वीकार की।

10

श्वेतवरण चंद सुविधि जिन, पद्म वासुपूज्य लाल। मुनि सुव्रत रिठनेम प्रभु, कृष्ण वरण सुविशाल।। मल्लिनाथ फुन पार्श्व प्रभु, नील वरण वर अंग। षोडस शेष जिनेश तनु, सोवन वरण सुचंग।।

अर्हत् चन्द्रप्रभ और सुविधि का वर्ण श्वेत, पद्मप्रभ और वासुपूज्य का वर्ण लाल, मुनि सुन्नत और अरिष्टनेमि का वर्ण श्याम, मल्लि और पार्श्व का वर्ण नीला तथा शेष सोलह अर्हतों का वर्ण सुनहला था।

11

श्रेयांस मल्ली सुव्रत जिन, नेम पार्श्व जगदीश। प्रथम प्रहर दीक्षा ग्रही, पाछिल पहर उगणीस।।

श्रेयांस, मल्लि, मुनि सुव्रत, नमि और पार्श्व ने पूर्वाह्न में मुनि दीक्षा स्वीकार की और शेष उन्नीस अर्हतों ने अपराह्न में।

12

सुमति जीम दीक्षा ग्रही, अठम-भक्त मल्लि पास। छट्ट्ठ-भक्त जिन वीस वर, वासुपूज्य उपवास।।

अर्हत् सुमति ने भोजन करके, मल्लि और पार्श्व ने तीन दिन के उपवास में, बीस तीर्थंकरों ने दो दिन के उपवास में और वासुपूज्य ने एक दिन के उपवास में दीक्षा स्वीकार की।

13

ऋषभ अष्टापद शिव गमन, वीर पावापुरी दीस। नेम गिरनारे, वासु चंपा, शिखर समेत सुबीस।।

अर्हत् ऋषभ अष्टापद पर्वत (हिमालय की एक श्रृंखला) पर, महावीर पावापुरी में, नेमि गिरनार पर्वत पर, वासुपूज्य चम्पापुरी में और शेष बीस अर्हत् सम्मेत शिखर पर परिनिर्वाण को प्राप्त हुए।

14

ऋषभ संथारे शिव-गमन, चउदस भक्त उदार। चरम छट्ठ अणसण पवर, बावीस मास संथार।।

अर्हत् ऋषभ छह दिन के अनशन में, महावीर दो दिन के अनशन में और शेष बाईस अर्हत् एक मास के अनशन में मुक्त हुए।

15

ऋषभ वीर अरु नेम जिन, पल्यंकासन पेख। शेष इक्कीस जिनेसरू, काउसग-मुद्रा देख।।

अर्हत् ऋषभ, महावीर और नेमि पर्यकासन में तथा शेष इक्कीस अर्हत् कायोत्सर्ग-मुद्रा में मुक्त हुए।

16

जिन चौबीस तणां सुगुण, रचियै वचन रसाल। ध्यान सुधा वर सार रस, ‘जय जश’ करण विशाल।।