प्रतिष्ठां संप्राप्ता मतिरतितरामाशु फलदा, चिदात्मा सिद्धात्मा दिशि विदिशि दॄष्टिर्गतिमती । अदॄष्टं संदॄष्टं सहजमुदितास्तत्त्वरुचयः, स्वयं धन्यः पुण्यो जयतु जयनामा मुनिपतिः ।।
जिनकी फल देने वाली मति शीघ्र ही प्रतिष्ठित हो गई । जो चिन्मय आत्मा, सिद्ध आत्मा थे । जिनकी दॄष्टि दिशाओं, विदिशाओं में गतिशील हो गई । जिन्होंने अदॄष्ट को समीचीनतया देखा । जिनकी तत्त्वरुचि सहज ही अभिव्यक्त हो रही थी । वे स्वयं धन्य और पवित्र मुनिपति जयाचार्य विजयी बने ।