मुख्य सामग्री पर जाएँ
‹ स्तोत्र

जय-अष्‍टकम्

1

प्रतिष्‍ठां संप्राप्ता मतिरतितरामाशु फलदा, चिदात्मा सिद्धात्मा दिशि विदिशि दॄष्‍टिर्गतिमती । अदॄष्‍टं संदॄष्‍टं सहजमुदितास्तत्त्वरुचयः, स्वयं धन्यः पुण्यो जयतु जयनामा मुनिपतिः ।।

जिनकी फल देने वाली मति शीघ्र ही प्रतिष्‍ठित हो गई । जो चिन्मय आत्मा, सिद्ध आत्मा थे । जिनकी दॄष्‍टि दिशाओं, विदिशाओं में गतिशील हो गई । जिन्होंने अदॄष्‍ट को समीचीनतया देखा । जिनकी तत्त्वरुचि सहज ही अभिव्यक्त हो रही थी । वे स्वयं धन्य और पवित्र मुनिपति जयाचार्य विजयी बने ।

2

यदैकाग्र्यं रम्यं कुशलजनवीक्षामुपगतं, न वा नृत्यं बाधाजनकमभवत् यत् क्षणमपि । चिरंजीवी तेरापथ इति जनोक्तिः श्रुतिमिता, स्वयं धन्यः पुण्यो जयतु जयनामा मुनिपतिः ।।

पाली के बाजार में नृत्य हो रहा था । एक दिन दुकान में मुनि जय लेखन का कार्य कर रहे थे । जनसमूह नाटक देख रहा था । एक कुशल व्यक्ति ने सोचा—यह छोटा मुनि जरूर नाटक देखेगा, पर वह व्यक्ति उस मुनि की मनोहरी एकाग्रता को देखता रहा । उसने उपस्थित जनसमूह से कहा—जिस पंथ में इतनी एकाग्रता वाला मुनि है, वह तेरापंथ चिरजीवी होगा । यह जनोक्ति एक कान से दूसरे कान तक पहुंच गई । वे स्वयं धन्य और पवित्र मुनिपति जयाचार्य विजयी बने ।

3

यदीयं वैराग्यं समजनि वयोद्वन्द्वविजयि, यदीयं वैराग्यं समजनि निजैर्द्वन्द्वविजयि । यदीयं वैराग्यं समजनि विशिष्‍टं स्वचरितैः, स्वयं धन्यः पुण्यो जयतु जयनामा मुनिपतिः ।।

वय ने कहा—अभी तुम छोटे हो, मुनि कैसे बनोगे ? वैराग्य ने कहा—मैं मुनि बनूंगा । इस विवाद में वैराग्य विजयी बन गया । परिवार के सदस्यों ने कहा—अभी तुम दीक्षा नहीं ले सकते । वैराग्य ने कहा—मैं दीक्षा ले सकता हूं । इस विवाद में वैराग्य विजयी बन गया । जिसका वैराग्य अपने चरित्र से विशिष्‍ट बन गया, वे स्वयं धन्य और पवित्र मुनिपति जयाचार्य विजयी बने ।

4

व्यवस्थायां साम्यं कुशलपटुयोगेन विहितं, न वृद्धोऽहंकारो न खलु ममकारोऽपि प्रकृतः । विनीतानां गीतं विनय—नयवृत्तं बहुतम, स्वयं धन्यः पुण्यो जयतु जयनामा मुनिपतिः ।।

जिसने कौशल और पटुता के योग से व्यवस्था में साम्य का प्रवर्तन किया, उस व्यवस्था में न कोई अहंकार का स्थान था और न ममकार का । जिसने विनीत साधु—साध्वियों के विनय और नीति से युक्त जीवनवृत्त का बार—बार संगान किया । वे स्वयं धन्य और पवित्र मुनिपति जयाचार्य विजयी बने ।

5

महो मर्यादाया न च दॄशिगतं नो श्रुतमपि, प्रकल्पोऽयं नव्यः कथमुदयमावाप मनसि । चिरायुष्कः संघः शुभमुपगतः प्राणपवनं, स्वयं धन्यः पुण्यो जयतु जयनामा मुनिपतिः ।।

मर्यादा का महोत्सव न देखा और न सुना । यह नया प्रकल्प कैसे मन में आया ? उसकी कल्याणकारी प्राण—पवन को प्राप्त कर संघ चिरजीवी हो रहा है । वे स्वयं धन्य और पवित्र मुनिपति जयाचार्य विजयी बने ।

6

द्वितीयोऽयं भिक्षुर्मतमिदमनेकैर्बुधजनैः, मनीषानैपुण्यं प्रकटमनुभूतं बुधजनैः । कृतज्ञानां पंक्तौ गुरुमिति विविक्तं बुधजनैः, स्वयं धन्यः पुण्यो जयतु जयनामा मुनिपतिः ।।

अनेक बुद्धिमान् लोगों ने माना—यह (जयाचार्य) दूसरा भिक्षु है । अनेक बुद्धिमान् लोगों ने स्पष्‍टता से अनुभव किया—इनकी मनीषा में निपुणता है । अनेक बुद्धिमान् लोगों ने यह विश्‍लेषण किया—कृतज्ञ व्यक्तियों की पंक्ति में यह गुरु है । वे स्वयं धन्य और पवित्र मुनिपति जयाचार्य विजयी बने ।

7

मयोक्तं तद् भाष्यं विशदमतिगम्यं सुनिपुणं, विधाताऽसौ भावीत्यवगतमिदं गम्यमधुना । अपूर्णा मे वाञ्छा न खलु बत दॄष्‍टं गुरुमुखं, स्वयं धन्यः पुण्यो जयतु जयनामा मुनिपतिः ।।

आचार्य भिक्षु ने जान लिया था कि मेरे द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का सूक्ष्म विवेचनापूर्ण भाष्य, जो विशद बुद्धिवालों के द्वारा गम्य हो सकता है, मेरे स्वर्गवास के अनन्तर जन्म लेने वाला यह शिशु करेगा । इसका आज हम अनुमान कर सकते हैं । जयाचार्य ने कहा मेरे मन में कोई आकांक्षा अपूर्ण नहीं रही । एक ही आकांक्षा अपूर्ण रही कि मैं तुम्हारा मुख नहीं देख सका । वे स्वयं धन्य और पवित्र मुनिपति जयाचार्य विजयी बने ।

8

अमूल्यं साहित्यं विविधविषयस्पर्शि रचितम्, अमोघं मंत्राणां विरचनमहो ! विघ्‍नशमनम् । अमूल्यं सद्ध्यानं भवतु सफलं भैक्षवगणे, स्वयं धन्यः पुण्यो जयतु जयनामा मुनिपतिः ।।

जिसने नाना विषयों को स्पर्श करने वाले अमूल्य साहित्य की रचना की, आश्‍चर्यकारी विघ्‍ननाशक अमोघ मंत्रों की रचना की, भिक्षु शासन में अमूल्य और समीचीन ध्यान (लेश्याध्यान) पद्धति का विकास किया, वह सफल हो । वे स्वयं धन्य और पवित्र मुनिपति जयाचार्य विजयी बने । आचार्यश्री महाप्रज्ञ द्वारा रचित