1अमाप्यं वात्सल्यं नयननलिने मूर्तिमगमत्,
अनेके संबुद्धाः प्रतिपदमितास्तोषमतुलम् ।
श्रुतं नाहं वच्मि स्वकमनुभवं वच्मि मुदितः,
स्वयं सिद्धः कालुर्भवतु सुतरां सिद्धिफलदः ।।
जिनका अमाप्य वात्सल्य नयनकमल में मूर्तिमान् बन गया, साकार बन गया, जिसे प्राप्त कर अनेक संबुद्ध व्यक्तियों ने पग—पग पर अतुलनीय तुष्टि का अनुभव किया है । मैं सुनी हुई बात नहीं कह रहा हूं, अपनी अनुभूत बात प्रसन्नता के साथ बता रहा हूं । वे स्वयंसिद्ध गुरुवर कालु सम्यक् प्रकार से हमें सिद्धि का फल दें ।
2जयाल्लब्धा शक्तिर्विनतिमहता श्रीमघवता,
ततोऽसौ संक्रान्ता स्फटिकविमले कालुहृदये ।
प्ररोहे संन्यस्ता सकलकलया कालुगुरुणा,
स्वयं सिद्धः कालुर्भवतु सुतरां सिद्धिफलदः ।।
विनम्रता से महान् बने हुए तेरापंथ धर्मसंघ के पांचवें आचार्यश्री मघवा ने चतुर्थ आचार्य श्रीमज्जयाचार्य से शक्ति प्राप्त की । मघवा की वह शक्ति स्फटिक के समान निर्मल अष्टमाचार्य कालु के हृदय में संक्रान्त हो गई । पूज्यवर कालुगुरु ने समस्त कलापूर्ण रीति से उस शक्ति को विकास के अंकुर में संन्यस्त कर दिया, नियोजित कर दिया । वे स्वयंसिद्ध गुरुवर कालु सम्यक् प्रकार से हमें सिद्धि का फल दें ।
3प्रणम्या सा शास्तिः प्रभवति यतो दिक्पथगतिः,
प्रणम्या सा शास्तिः श्रवणविरसा चापि सरसा ।
यदादौ चान्तेऽपि प्रवहति वरा प्रेमसलिला,
स्वयं सिद्धः कालुर्भवतु सुतरां सिद्धिफलदः ।।
वह अनुशासन प्रणम्य है, जिससे दिशा प्राप्त होती है और पथ की गति प्राप्त होती है । वह अनुशासन प्रणम्य है, जो सुनने में विरस होते हुए भी सरस है, परिणाम में रसमय है, जिसके आदि और अन्त में प्रवर प्रेम का सलिल प्रवाहित है । वे स्वयंसिद्ध गुरुवर कालु सम्यक् प्रकार से हमें सिद्धि का फल दें ।
4सुलब्धं तच्चक्षुः सुकृतिमतिलभ्यं गुरुतरं,
सुदूरं संदॄष्टं किमिह भविता बौद्धिकयुगे ।
अलब्धं लब्धं स्याद् भवति फलितोऽयं सुरतरुः,
स्वयं सिद्धः कालुर्भवतु सुतरां सिद्धिफलदः ।।
गुरुवर कालु ने वह चक्षु प्राप्त किया था, जो पुण्यवान व्यक्तियों की मति द्वारा प्राप्य है और जो गुरुतर है—गरिमासम्पन्न है । उन्होंने उस चक्षु से सुदूर को देखा कि आने वाले बौद्धिक युग में क्या होने वाला है । दूरदर्शन के द्वारा अलब्ध भी लब्ध होता है और उससे विद्या का सुरतरु फलित हो जाता है । वे स्वयंसिद्ध गुरुवर कालु सम्यक् प्रकार से हमें सिद्धि का फल दें ।
5सुधन्यं तत् स्थानं प्रवरमहनीयास्पदमभूत्,
स्थितो यस्मिन् विद्याध्ययननिरतः शासनपतिः ।
विचित्रं छात्रोऽसौ गुरुरपि सलक्ष्यं कृतमतिः,
स्वयं सिद्धः कालुर्भवतु सुतरां सिद्धिफलदः ।।
वह स्थान धन्य है, जो प्रवर महिमा—मंडित स्थान बन गया, जहां विद्याध्ययन में निरत होकर शासनपति विराजमान हुए । लोगों ने देखा—आश्चर्य है कि ये गुरु होते हुए भी लक्ष्यपूर्वक अपनी मति को अर्पित कर छात्र बने हुए हैं । वे स्वयंसिद्ध गुरुवर कालु सम्यक् प्रकार से हमें सिद्धि का फल दें ।
6सुरक्षा संघस्य प्रथममिह दायित्वमुचितं,
द्वितीयं दायित्वं विनयनययोग्यस्य चयनम् ।
अमेयं कर्तृत्वं गणिपदविशेषं प्रथयति,
स्वयं सिद्धः कालुर्भवतु सुतरां सिद्धिफलदः ।।
आचार्य का पहला औचित्यपूर्ण दायित्व है—संघ की सुरक्षा । दूसरा दायित्व है—विनय तथा नय (नीति) से योग्य शिष्य का चयन करना, उत्तराधिकारी का मनोनयन । उसका अमेय (अमाप्य) कर्तृत्व आचार्य पद के वैशिष्ट्य का विस्तार करता है । वे स्वयंसिद्ध गुरुवर कालु सम्यक् प्रकार से हमें सिद्धि का फल दें ।
7सुधीनां शिष्याणामजनि शुभसम्पत् फलवती,
विशिष्टं सौभाग्यं विलसति विशिष्टा ग्रहगतिः ।
तृतीयं नेत्रं यत् परमपुरुषार्थेन विशदं,
स्वयं सिद्धः कालुर्भवतु सुतरां सिद्धिफलदः ।।
पूज्यवर कालुगणी के कर्तृत्व से विद्वान् शिष्यों की शुभ सम्पदा फलवती हो गई, प्राप्त हो गई । उनका सौभाग्य विशिष्ट था, ग्रहों की गति भी विशिष्ट थी । उन्होंने उत्कृष्ट पुरुषार्थ के द्वारा अपने तीसरे नेत्र को निर्मल बना लिया । स्वयंसिद्ध गुरुवर कालु सम्यक् प्रकार से हमें सिद्धि का फल दें ।
8अहं मन्ये भाग्यं शिरसि निहितः पाणिरमलः,
परं भाग्यं लब्धः सुमुनितुलसी देवकृपया ।
महाप्रज्ञः स्वामिन् ! शिशुरपि सुदॄष्टोऽस्मि सुदॄशा,
स्वयं सिद्धः कालुर्भवतु सुतरां सिद्धिफलदः ।।
पूज्यवर कालुगणी ने अपना पवित्र हाथ मेरे सिर पर रखा, इसे मैं अपना भाग्य मानता हूं । पूज्य कालुगणी की कृपा से मुझे मुनि तुलसी जैसे विद्यागुरु प्राप्त हुए, इसे भी मैं अपना परम भाग्य मानता हूं । हे स्वामिन् ! मैं यह शिशु महाप्रज्ञ (दीक्षा लेते ही) आपकी शुभ दॄष्टि से अच्छी प्रकार से देखा गया हूं । वे स्वयंसिद्ध गुरुवर कालु सम्यक् प्रकार से हमें सिद्धि का फल दें ।