अमाप्यं वात्सल्यं नयननलिने मूर्तिमगमत्, अनेके संबुद्धाः प्रतिपदमितास्तोषमतुलम् । श्रुतं नाहं वच्मि स्वकमनुभवं वच्मि मुदितः, स्वयं सिद्धः कालुर्भवतु सुतरां सिद्धिफलदः ।।
जिनका अमाप्य वात्सल्य नयनकमल में मूर्तिमान् बन गया, साकार बन गया, जिसे प्राप्त कर अनेक संबुद्ध व्यक्तियों ने पग—पग पर अतुलनीय तुष्टि का अनुभव किया है । मैं सुनी हुई बात नहीं कह रहा हूं, अपनी अनुभूत बात प्रसन्नता के साथ बता रहा हूं । वे स्वयंसिद्ध गुरुवर कालु सम्यक् प्रकार से हमें सिद्धि का फल दें ।