पुनीतान्तःप्रज्ञा गहनतम—तत्त्वेषु निपुणा, श्रुतस्वाध्यायेन सुविदितरहस्यो विभुवरः । प्रशस्या शास्त्राणां सुषमतर—सम्पादन—सृतिः, महाप्रज्ञः पूज्यो जिनपतिसरूपो गुरुवरः ।।
आपकी पुनीत अन्त:प्रज्ञा गहनतम तत्त्वों को जानने में निपुण है । आपने आगमों के स्वाध्याय से उनके रहस्यों को भलीभांति आत्मसात् कर लिया है । आपके द्वारा विहित आगमों के सुसम्पादन का कार्य प्रशस्य है, श्लाघ्य है, ऐसे पूज्य गुरुवर महाप्रज्ञ तीर्थंकर के तुल्य हैं ।