1श्रेयस्करः सुखकरः सुमतिप्रदाता,
सर्वप्रियो हितकरः सुसमाधिदाता ।
सत्यव्रती श्रमरतिश्च महातपस्वी,
पूतः प्रभास्वर—महाश्रमणः पुनातु ।।
जो श्रेयस्कर हैं, सुख के स्रष्टा हैं, सुमति (श्रेष्ठ मति) प्रदाता हैं, सबके प्रिय हैं, हित सम्पादित करने वाले हैं, समस्याओं के सम्यक् समाधायक हैं, सत्य जिनका व्रत है, श्रम जिन्हें प्रिय है, जो महातपस्वी हैं, ऐसे पवित्र एवं प्रभास्वर व्यक्तित्व के धारक आचार्यश्री महाश्रमण हमें पवित्र करें ।
2धत्ते क्षमां श्रयति मुक्तिमनाविलां वै,
पुष्णाति नित्यमृजुतां सह मार्दवेन ।
जागर्व्यहो ! श्रमणधर्मसुसाधनाय,
पूतः प्रभास्वर—महाश्रमणः पुनातु ।।
जो क्षमाशील हैं, जिनकी अनासक्ति विशद है, ऋजुता और मुदुता पुष्ट है, जो सदैव श्रमण धर्म की साधना के प्रति जागरूक हैं, ऐसे पवित्र एवं प्रभास्वर व्यक्तित्व के धारक आचार्यश्री महाश्रमण हमें पवित्र करें ।
3स्वात्मोपलब्धिरिति लक्ष्यमिदं महीयः
लक्ष्यं द्वितीयमनिशं खलु संघसेवा ।
श्री—जैन—शासन—विकास विवर्धना च,
पूतः प्रभास्वर—महाश्रमणः पुनातु ।।
जिनके दो महान् लक्ष्य हैं । पहला लक्ष्य है—आत्मोपलब्धि और दूसरा लक्ष्य है—तेरापंथ धर्मसंघ की सेवा एवं जैनशासन की श्रीवृद्धि, ऐसे पवित्र एवं प्रभास्वर व्यक्तित्व के धारक आचार्यश्री महाश्रमण हमें पवित्र करें ।
4कीदॄग् भवेन्मुनिरयं प्रथितो हि प्रश्नः,
कल्याणभाग् मुनिरसौ मुदितः प्रमाणम् ।
आदर्शरूपममलं यतिनां पुरस्तात्,
पूतः प्रभास्वर—महाश्रमणः पुनातु ।।
मुनि कैसा होना चाहिए ? इस सन्दर्भ में मुनि के मानकों की चर्चा करते हुए आचार्यश्री तुलसी ने मुनि मुदित (आचार्यश्री महाश्रमण) को प्रमाण रूप प्रस्तुत करते हुए कहा—मुनि हो तो इसके जैसे भद्र होना चाहिए । यह मुनियों के लिए विशद आदर्श रूप है, ऐसे पवित्र एवं प्रभास्वर व्यक्तित्व के धारक आचार्यश्री महाश्रमण हमें पवित्र करें ।
5शान्तः सुनीतिकुशलो विमलो विशिष्टः,
सौभाग्य—पौरुषयुतः प्रखरः प्रवक्ता ।
साम्ये स्थितः स्थिरमतिध्रुवयोगयुक्तः,
पूतः प्रभास्वर—महाश्रमणः पुनातु ।।
जो शान्त और नीति निपुण हैं, विमल हैं, वैशिष्ट्य प्राप्त हैं, जिनके जीवन में भाग्य और पुरुषार्थ की युति है, जो प्रखर वक्ता हैं, साम्ययोगी, स्थितप्रज्ञ और ध्रुव योग से युक्त हैं, ऐसे पवित्र एवं प्रभास्वर व्यक्तित्व के धारक आचार्यश्री महाश्रमण हमें पवित्र करें ।
6वर्यो विनेयनिवहे विदितो वदान्यः,
सभ्योऽन्तरंगसमितौ मुदितो मुमुक्षुः ।
आराधको गुरुदॄशः सुसमर्पितात्मा,
पूतः प्रभास्वर—महाश्रमणः पुनातु ।।
मुनि मुदित जो शिष्य समुदाय में श्रेष्ठ, प्रख्यात, उदार और अंतरंग समिति के सदस्य रहे हैं, जो गुरुदॄष्टि के आराधक और पूर्ण समर्पित रहे हैं, ऐसे पवित्र एवं प्रभास्वर व्यक्तित्व के धारक आचार्यश्री महाश्रमण हमें पवित्र करें ।
7सर्वं समीक्ष्य कुरुते प्रकृतं विलोक्य,
किं वा भविष्यति मया करणीयमस्ति ।
संभावितं समुचितं प्रविलोकमानः,
पूतः प्रभास्वर—महाश्रमणः पुनातु ।।
जो अपने कृत कार्य को ध्यान में रख उसकी समीक्षा करके कार्य करते हैं, जो भविष्य में मेरे लिए क्या करणीय है, इस पर दॄष्टि रखते हुए समुचित संभावनाएं खोजते हैं, ऐसे पवित्र एवं प्रभास्वर व्यक्तित्व के धारक आचार्यश्री महाश्रमण हमें पवित्र करें ।
8गांभीर्य—धैर्यसहितोऽवहितो नितान्त—
माध्यात्मिको मितवचा विदुषां वरेण्यः ।
तेजोमयो जितभयो ननु पापभीरुः,
पूतः प्रभास्वर—महाश्रमणः पुनातु ।।
जिनमें गम्भीरता, धीरता जैसे विशिष्ट गुण हैं, जिनकी एकाग्रता उत्कर्ष पर है एवं जो आध्यात्मिक व्यक्तित्व के धारक हैं, जो मितभाषी एवं विद्वज्जनों में अग्रणी हैं, जो तेजस्वी, अभय और पापभीरु हैं, ऐसे पवित्र एवं प्रभास्वर व्यक्तित्व के धारक आचार्यश्री महाश्रमण हमें पवित्र करें ।