यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचितः, समे भान्ति ध्रौव्य—व्यय—जनि—लसन्तोऽन्तरहिताः । जगत्—साक्षी मार्गप्रकटनपरो भानुरिव यो, महावीरस्वामी नयन—पथ—गामी भवतु मे ।।
दर्पण की भांति जिनके चैतन्य में उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यात्मक अनन्त जड़—चेतन पदार्थ समानरूप से प्रतिभाषित हो रहे हैं, जो जगत-साक्षी हैं—परम आत्मा हैं, जो सूर्य की भांति मोक्षमार्ग दिखाने में तत्पर हैं, वे भगवान महावीर स्वामी मेरे नयन पथ में बस जाएं ।