णमो अरहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं एसो पंच णमुक्कारो, सव्व पावपणासणो। मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं।।
मैं अरिहंत भगवानों को नमस्कार करता हूँ। अरिहंत वे आत्माएँ हैं जिन्होंने क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे सभी आंतरिक शत्रुओं को जीत लिया है, केवलज्ञान प्रकट कर लिया है, लेकिन अभी भी शरीर में विराजमान हैं और लोककल्याण के लिए उपदेश देते हैं। उदाहरण के लिए भगवान महावीर केवलज्ञान प्राप्ति के बाद और निर्वाण से पूर्व अरिहंत थे। मैं सिद्ध भगवानों को नमस्कार करता हूँ। सिद्ध वे पूर्ण मुक्त आत्माएँ हैं जिन्होंने सभी कर्मों का क्षय कर दिया है, जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो गई हैं और लोक के सर्वोच्च भाग (सिद्धशिला के ऊपर) अशरीरी रूप में विराजमान हैं। उदाहरण के लिए भगवान महावीर निर्वाण के बाद सिद्ध बन गए। मैं आचार्यों को नमस्कार करता हूँ। आचार्य साधु-संघ के प्रमुख होते हैं। वे धर्म, अनुशासन और साधना का मार्गदर्शन करते हैं तथा पूरे संघ का संचालन करते हैं। उदाहरण के लिए आचार्य भिक्षु, आचार्य तुलसी, आचार्य महाप्रज्ञ और आचार्य महाश्रमण। मैं उपाध्यायों को नमस्कार करता हूँ। उपाध्याय वे महान गुरु होते हैं जो आगम, शास्त्र और आध्यात्मिक ज्ञान के ज्ञाता होते हैं तथा साधकों को धर्म का गहन अध्ययन कराते हैं। मैं संसार के सभी साधु-संतों को नमस्कार करता हूँ। साधु वे होते हैं जिन्होंने सांसारिक मोह-माया का त्याग कर पंच महाव्रतों को धारण किया है तथा संयम, साधना और आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया है। उदाहरण के लिए जैन मुनि और साध्वियाँ। यह पाँच प्रकार का नमस्कार सभी पापों और अशुभ भावों का पूर्णतः नाश करने वाला है। संसार के समस्त मंगलों में यह नवकार महामंत्र सर्वोच्च, श्रेष्ठ और प्रथम मंगल है। यह महामंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि का दिव्य मार्ग है। इसके नियमित स्मरण से अहंकार मिटता है, मन शांत होता है और आत्मा में परम मंगल तथा कल्याण की भावना जागृत होती है। 🙏जय जिनेंद्र🙏