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परमेष्‍ठी वन्दना

वन्दना आनन्द—पुलकित, विनयनत हो मैं करूं । · एक लय हो, एक रस हो भाव तन्मयता वरूं ।। · णमो अरहंताणं (अरहंतों को मेरा नमस्कार हो । वे कैसे हैं ?)

1

सहज निज आलोक से भासित स्वयं संबुद्ध हैं । धर्म तीर्थंकर शुभंकर, वीतराग विशुद्ध हैं । गति—प्रतिष्‍ठा, त्राण—दाता, आवरण से मुक्त हैं । देव अर्हन् दिव्य योगज अतिशयों से युक्त हैं ।।

णमो सिद्धाणं (सिद्धों को मेरा नमस्कार हो । वे कैसे हैं ?)

2

बन्धनों की श्रृंखला से, मुक्त शक्ति—स्रोत हैं । सहज निर्मल आत्मलय में सतत ओत:प्रोत हैं । दग्ध कर भव बीज अंकुर अरुज, अज, अविकार हैं । सिद्ध परमात्मा परम, ईश्‍वर अपुनरवतार हैं ।।

णमो आयरियाणं (धर्माचार्यों को मेरा नमस्कार हो । वे कैसे हैं ?)

3

अमलतम आचार धारा में स्वयं निष्णात हैं । दीप सम शत दीप दीपन के लिए प्रख्यात हैं । धर्म—शासन के धुरन्धर, धीर धर्माचार्य हैं । प्रथम पद के प्रवर—प्रतिनिधि, प्रगति में अनिवार्य हैं ।।

णमो उवज्झायाणं (उपाध्यायों को मेरा नमस्कार हो । वे कैसे हैं ?)

4

द्वादशांगी के प्रवक्ता, ज्ञान गरिमा पुंज हैं । साधना के शान्त उपवन में सुरम्य निकुंज हैं । सूत्र के स्वाध्याय में संलग्‍न रहते हैं सदा । उपाध्याय महान श्रुतधर, धर्म—शासन सम्पदा ।।

णमो लोए सव्वसाहूणं (लोक के सब साधुओं को मेरा नमस्कार हो । वे कैसे हैं ?)

5

सदा लाभ—अलाभ में, सुख—दुःख में मध्यस्थ हैं । शान्तिमय, वैराग्यमय, आनन्दमय आत्मस्थ हैं । वासना से विरत आकृति, सहज परम प्रसन्‍न हैं । साधना धन साधु अन्तर्भाव में आसन्‍न हैं ।।