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श्री घंटाकर्ण महावीर मंत्र-स्तोत्र

घंटाकर्ण महावीर स्तोत्र जैन परंपरा में श्रद्धा और आस्था का प्रतीक माना जाता है। यह स्तोत्र भय, रोग, बाधा और अनिष्ट से रक्षा की भावना से जपा जाता है। मान्यता है कि इसके पाठ से मानसिक शांति मिलती है और नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं। भक्त इसे विशेष रूप से संकट, रोग या भय के समय श्रद्धापूर्वक जपते हैं। यह स्तोत्र भक्ति, साहस और आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला माना जाता है।

परंपरागत

1

ॐ घंटाकर्णो महावीरः सर्वव्याधि-विनाशकः। विस्फोटक भयं प्राप्ते, रक्ष-रक्ष महाबलः ॥

ॐ स्वरूप वाले घंटाकर्ण नामक महान वीर देव। जो सभी प्रकार की बीमारियों का नाश करते हैं। जब भयंकर रोग या महामारी का भय उत्पन्न हो। हे महाबली देव! हमारी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।

2

यत्र त्वं तिष्ठसे देव, लिखितोऽक्षर-पंक्तिभिः। रोगास्तत्र प्रणश्यन्ति, वातपित्त कफोद्भवाः ॥

हे देव! जहाँ आप निवास करते हैं। जहाँ आपके नाम की अक्षरों में लिखी पंक्तियाँ होती हैं। वहाँ सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। वात, पित्त और कफ से उत्पन्न रोग भी समाप्त हो जाते हैं।

3

तत्र राजभयं नास्ति, यान्ति कर्णे जपात् क्षयम्। शाकिनी-भूत वेताला, राक्षसाः प्रभवन्ति नो ॥

वहाँ किसी प्रकार का राजकीय या शासकीय भय नहीं रहता। कान में इस मंत्र के जप से भय और कष्ट नष्ट हो जाते हैं। शाकिनी, भूत और वेताल जैसे बाधक तत्त्व। वे किसी प्रकार का प्रभाव नहीं डाल पाते।

4

नाकाले मरणं तस्य, न च सर्पेण दृश्यते। अग्नि चौर भयं नास्ति, नास्ति तस्य प्यरि-भयं ॥

उस व्यक्ति की अकाल मृत्यु नहीं होती। और उसे सर्प से भय या हानि नहीं होती। अग्नि और चोर का भी कोई भय नहीं रहता। उस व्यक्ति को शत्रुओं का भी भय नहीं होता।

5

ॐ ह्रीँ श्रीं घंटाकर्णो महावीर नमोऽस्तु ते ठः ठः ठः स्वाहा॥

ॐ, ह्रीँ, श्रीं सहित घंटाकर्ण महावीर को मेरा नमन है – उनकी दिव्य शक्ति से रक्षा हो। यह स्तोत्र घंटाकर्ण महावीर की रक्षा-शक्ति और करुणा को प्रकट करता है। श्रद्धा से इसके पाठ और स्मरण से भय, रोग और बाधाएँ दूर होती हैं तथा साधक के जीवन में शांति और सुरक्षा बनी रहती है। घंटाकर्ण मंत्र का 21 बार जप करने से रोगभय, चोरभय, अग्नि और सर्प का भय दूर होता है तथा सब प्रकार की भूत-प्रेत आदि बाधाएं भी दूर होती हैं। 🙏 जय जिनेंद्र 🙏