तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि वंदामि नमंसामि सक्कारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएणं वंदामि
मैं तीन बार। दाहिनी ओर से (बाहिनी की तरफ़) प्रदक्षिणा। करता हूँ। मैं मस्तक झुकाकर वंदना करता हूँ। इस गुरु वंदना पाठ में साधु-साध्वियों को तीन बार श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है। इसका भाव है कि उनके त्याग, संयम और ज्ञान से हमें सही मार्गदर्शन मिले और हमारा जीवन शुद्ध व धर्ममय बने। जय जिनेंद्र मैं नमस्कार करता हूँ। मैं आदर करता हूँ। मैं सम्मान करता हूँ। आप कल्याण स्वरूप हैं। आप मंगल स्वरूप हैं। आप देवतुल्य हैं। आप पूजनीय हैं। मैं आपकी उपासना करता हूँ।