पायो पद जिनराज नौं सुध ध्यान निर्मल ध्याय भलां जी कांई ।। अनंत नाम-जिन चवदमां रे, द्रव्य चौथे गुणठाण । भावे जिन हुवै तेरमे रे, इतलै द्रव्य जिन जाण ।। १ ।।
अनन्तनाथ प्रभो ! चतुर्थ गुणस्थान में तुम द्रव्य (भावी) तीर्थंकर थे । वास्तव में तीर्थंकर तेरहवें गुणस्थान में होते हैं, उससे पहले द्रव्य तीर्थंकर होते हैं ।