1पायो पद जिनराज नौं सुध ध्यान निर्मल ध्याय भलां जी कांई ।। अनंत नाम-जिन चवदमां रे, द्रव्य चौथे गुणठाण । भावे जिन हुवै तेरमे रे, इतलै द्रव्य जिन जाण ।। १ ।।
अनन्तनाथ प्रभो ! चतुर्थ गुणस्थान में तुम द्रव्य (भावी) तीर्थंकर थे । वास्तव में तीर्थंकर तेरहवें गुणस्थान में होते हैं, उससे पहले द्रव्य तीर्थंकर होते हैं ।
2जिन चक्री सुर जुगलिया रे, वासुदेव बलदेव । पंचम गुण पावै नहीं रे, ए रीत अनादि स्वमेव ।। २ ।।
अर्हत्, चक्रवर्ती, देव, यौगलिक मनुष्य, वासुदेव और बलदेव पांचवें गुणस्थान को प्राप्त नहीं करते । यह स्वयं संभूत अनादिकाल की रीति है ।
3संजम लीधौ तिण समैं रै, आया सप्तम गुणठाण । अंतरमुहूर्त तिहां रही रे, छठे बहुस्थिति जाण ।। ३ ।।
तुमने जब संयम स्वीकार किया, उस समय तुमने सातवें गुणस्थान का आरोहण कर लिया । उसमें अन्तरमुहूर्त्त ठहर तुम छठे गुणस्थान में आ गये । वहां लम्बे समय तक रहे ।
4आठमा थी दोय श्रेणि छे रे, उपशम क्षपक पिछाण । उपशम जाय इग्यारमे रे, मोह दबावतो जाण ।। ४ ।।
आठवें गुणस्थान से दो श्रेणियां प्रारंभ होती हैं—उपशम और क्षपक । उमशम श्रेणी का आरोहण करने वाला मोह को दबाता हुआ ग्यारहवें गुणस्थान तक चला जाता है ।
5श्रेणि उपशम जिन नां लहै रे, खपक श्रेणि धर खंत । चारित्र मोह खपावतां रे, चढ़िया ध्यान अत्यंत ।। ५ ।।
तीर्थंकर उपशम श्रेणी का आरोहण नहीं करते । वे क्षपक श्रेणी का आरोहण करते हैं । तुम चारित्रमोह को क्षीण करते हुए ध्यान के उच्च सोपान पर आरूढ़ हो गए ।
6नवमे आदि संजल चिहुं रे, अन्त समे इक लोभ । दसमे सूक्षम मात्र ते रे, सागार उपयोग सोभ ।। ६ ।।
नौवें गुणस्थान के प्रारंभ में चारों संज्वलन कषाय होते हैं । उसके अन्तिम समय में केवल संज्वलन लोभ रहता है । दशवें गुणस्थान में वह सूक्ष्ममात्रा में बचता है । उस समय साकारोपयोग (ज्ञानात्मक चेतना) ही होता है ।
7एकादशम उलंघ नै रे, बारमे मोह खपाय । त्रिकर्म इक सम तोड़तां है, तेरम केवल पाय ।। ७ ।।
ग्यारहवें गुणस्थान को लांघकर बारहवें में मोह को क्षीण कर ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन कर्मों को एक साथ तोड़ तेरहवें में तुमने केवलज्ञान प्राप्त कर लिया ।
8तीर्थ थाप जोग रुंध नै रे, चवदमां थी शिव पाय । उगणीसै पूनम भाद्रवी रे, अनन्त रट्या हरषाय ।। ८ ।।
तीर्थ की स्थापना कर अब तुम वास्तविक तीर्थंकर बन गये और अन्त में योग (मन, वचन और शरीर की चंचलता) का निरोध कर चौदहवें गुणस्थान से मोक्ष को प्राप्त कर लिया । मैंने हर्षित होकर तुम्हारी स्तवना की ।