1मोनैं प्यारा लागै छै जी अर जिनराज । मोनें वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।। अर जिन कर्म-अरी नां हंता, जगत उधारण ज्हाज । मोनें वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।। १ ।।
प्रभो ! तुम अहितकर कर्मों को प्रतिहत करने वाले हो और संसार-समुद्र से उद्धार करने के लिए जलपोत के समान हो ।
2परिषह उपसर्ग रूप अरी हण, पाया केवल पाज । मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।। २ ।।
आत्महित में बाधक परीषह और उपसर्गों को अभिभूत कर तुमने केवलज्ञान-रूपी सेतुबंध पा लिया ।
3नैण न धापै निरखतांजी, इन्द्राणी सुरराज । मोनें वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।। ३ ।।
तुम्हारे दर्शन करते-करते इन्द्र और इन्द्राणी के नयन भी तृप्त नहीं होते ।
4वारु रे जिनेश्वर रूप अनूपम, तू सुगणा-सिरताज । मोनें वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।। ४ ।।
प्रभो ! तुम्हारा बाह्य और आंतरिक रूप अनुपम है । तुम गुणिजनों के सिरताज हो ।
5वाण विशाल दयाल-पुरुष नीं, भूख तृषा जाए भाज । मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।। ५ ।।
प्रभो ! तुम दयालु पुरुष हो । तुम्हारी वाणी विशाल है । उसे सुनते-सुनते मनुष्य भूख और प्यास को भी भूल जाता है ।
6शरणै आयो स्वाम रै जी, अविचल सुख नै काज । मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।। ६ ।।
मैं शाश्वत सुख के लिए तुम्हारी शरण में आया हूं ।
7उगणीसै आसू बिद एकम, आणन्द उपनौं आज । मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज ।। ७ ।।
मुझे आज आनंद की अनुभूति हुई ।