1प्रभु ! चन्द जिनेश्वर ! चन्द जिसा । हो प्रभु ! चंद जिनेश्वर चंद जिसा, वाणी शीतल चंद सी न्हाल हो । प्रभु ! उपशम रस जन सांभल्यां, मिटै करम भरम मोह जाल हो ।। १ ।।
प्रभो ! तुम्हारी वाणी चन्द्रमा की भांति शीतल और उपशम रस से भरी हुई है । जो व्यक्ति उसे सुनते हैं, उनके कर्म, भ्रम और मोहजाल दूर हो जाते हैं ।
2हो प्रभु ! सूरत मुद्रा सोहनी, वारु रूप अनूप विशाल हो । प्रभु ! इंद्र शची जिन निरखता, ते तो तृप्त ने होवे निहाल हो ।। २ ।।
प्रभो ! तुम्हारी सूरत-मुद्रा सुहावनी है, तुम्हारा रूप उदार, अनुपम और श्रेष्ठ है । इन्द्र तथा इन्द्राणी तुम्हें देखकर तृप्त ही नहीं हो पाते हैं ।
3अहो ! वीतराग प्रभु तुं सही, तुम ध्यान ध्यावै चित रोक हो । प्रभु ! तुम तुल्य ते हुवै ध्यान हूं, मन पायां परम संतोष हो ।। ३ ।।
प्रभो ! तुम सही अर्थ में वीतराग हो । जो अपने चित्त को एकाग्र बना तुम्हारा ध्यान करते हैं, वे परम मानसिक तोष की प्राप्ति होने पर ध्यान-चेतना के द्वारा तुम्हारे समान बन जाते हैं ।
4हो प्रभु ! लीनपणै तुम ध्यावियां, पामै इंद्रादिक न ऋद्धि हो । बलि विविध भोग सुख संपदा, लहै आमोसही आदि लब्धि हो ।। ४ ।।
प्रभो ! तल्लीनता पूर्वक तुम्हारा ध्यान करने से इन्द्र आदि की ऋद्धि प्राप्त होती है, विविध भोग-सामग्री, सुख-सम्पदा तथा आमर्षोंषधि आदि लब्धियां प्राप्त होती हैं ।
5हो प्रभु ! नरेंद्र पद पामै सही, चरण सहित ध्यान तन मन्न हो । प्रभु ! अहमिंद्र पद पामै बलि, कियां निश्चल थारो भजन्न हो ।। ५ ।।
प्रभो ! निश्चल मन से तुम्हारा भजन करने वाला नरेन्द्र पद को प्राप्त होता है । चारित्र युक्त तन-मन से ध्यान करने वाला अहमिंद्र पद को प्राप्त होता है ।
6हो प्रभु ! शरण आयो तुझ साहिबा, तुम ध्यान धरूं दिन-रैन हो । तुझ मिलवा मुझ मन उमह्यो, तुम समरण स्यूं सुख चैन हो ।। ६ ।।
प्रभो ! मैं तुम्हारा शरणागत हूं और दिन-रात तुम्हारा ध्यान करता हूं । मेरा मन तुमसे मिलने के लिए उतावला हो रहा है । तुम्हारे सुमिरन से मुझे सुख-चैन का अनुभव होता है ।
7हो प्रभु ! संवत उगणीसै नैं भाद्रवै, सुदि तेरस ने बुधवार हो । प्रभु ! चंद जिनेश्वर समरिया, हुओ आनन्द हरष अपार हो ।। ७ ।।
प्रभो ! तुम्हारा सुमिरन करने से मुझे अपार आनन्द और प्रसन्नता हुई ।