1अहो प्रभु परम देव प्यारा । धर्म जिन धर्म तणा धोरी, त्रटक मोह-पाश नाख्या तोड़ी । चरण-धर्म आतम सूं जोड़ी, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।। १ ।।
धर्म प्रभु ! तुम धर्म-धुरा को धारण करने वाले हो । तुमने चारित्र धर्म के साथ आत्मा को जोड़ा और एक झटके से मोहपाश तोड़ डाला ।
2शुकल ध्यानामृत रस लीना, संवेग रसे करि जिन भीना । प्याला प्रभु उपशम नां पीना, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।। २ ।।
तुम शुक्ल ध्यान रूपी अमृत रस में लीन थे, संवेग रस से भीगे हुए थे और तुम प्याले भर-भर उपशम रस का पान करते थे ।
3जाण्या शब्दादिक मोहजाला, रमणि-सुख किंपाक सम काला । हेतु नरकादिक दुख आला, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।। ३ ।।
प्रभो ! तुमने जाना—शब्द आदि इन्द्रिय-विषय मोहपाश हैं और वैषयिक सुख किम्पाक फल के समान अनिष्ट कारक तथा नरक आदि में होने वाले दुःखों का उत्कृष्ट हेतु है ।
4पुद्गल सुख अरि जाण्या स्वामी, ध्याने थिरचित आतम-धामी । जोड़ी युग केवल नीं पामी, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।। ४ ।।
धर्म प्रभु ! तुम पौद्गलिक सुखों को अहितकर जान, ध्यान में चित्त को स्थिर कर आत्म-धाम में पहुंच गये । वहां तुम्हें एक जोड़ी मिली—केवलज्ञान और केवलदर्शन ।
5थाप्या प्रभु च्यार तीरथ तायो, आख्यो धर्म जिन मांह्यो । आज्ञा बारै अधरम दुखदायो, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।। ५ ।।
प्रभौ ! तुमने चतुर्विध तीर्थ की स्थापना की । तुमने बताया—अर्हत् के अनुशासन में धर्म है और अनुशासन के बाहर अधर्म है, वह दुःख देने वाला है ।
6विरत धर्म धर्म-जिनंद ख्याता, अव्रत कही अधरम दुख दाता । सावद निरवद जू जुआ कह्या खाता, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।। ६ ।।
अर्हत् धर्म ने व्रत को धर्म और अव्रत को अधर्म बतलाया । सावद्य और निरवद्य के खाते अलग-अलग हैं ।
7बहुजन तार मुक्ति पाया, उगणीसै आसू धुर दिन आया । धर्म जिन रटवै सुख पाया, अहो प्रभु परम देव प्यारा ।। ७ ।।
प्रभो ! तुमने बहुत लोगों को संसार-समुद्र के पार पहुंचाकर मुक्ति का वरण किया । धर्मप्रभु का नाम जपने से मुझे बहत सुख मिला ।