प्रभु को समरण कर नीको रे । कुन्थु जिनेश्वर करुणा-सागर, त्रिभुवन सिर टीको रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।। १ ।।
कुन्थु प्रभु ! तुम करुणासागर और त्रिभुवन के सिर पर तिलक हो ।
प्रभु को समरण कर नीको रे । कुन्थु जिनेश्वर करुणा-सागर, त्रिभुवन सिर टीको रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।। १ ।।
कुन्थु प्रभु ! तुम करुणासागर और त्रिभुवन के सिर पर तिलक हो ।
अद्भुत रूप अनूप कुन्थु जिन, दर्शन जग-पी को रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।। २ ।।
तुम्हारा रूप अद्भुत और अनुपम है । वह समूचे जगत् को प्रिय है ।
वाण सुधा सम उपशम रस नीं, वाल्हौ जग ती को रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।। ३ ।।
उपशम रस से भरी हुई तुम्हारी वाणी अमृत के समान है । उससे तुम तीन लोक के वल्लभ बन गये ।
अनुकंपा दोय श्री जिन दाखी, मर्म समदृष्टि को रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।। ४ ।।
तुमने सावद्य और निरवद्य दो प्रकार की अनुकम्पा बतायी । यह सम्यक् दृष्टि का मर्म है ।
असंजती रो जीवणो बांछै, ते सावद्य तहती को रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।। ५ ।।
असंयमी के जीने की इच्छा करना वास्तव में सावद्य है ।
निरवद्य करुणा करि जन तार्या, धर्म ए जिनजी को रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।। ६ ।।
तुमने निरवद्य (रागातीत) करुणा द्वारा जनता को संसार समुद्र के पार पहुंचाया । यह तुम्हारी साधना का रहस्य है ।
संवत उगणीसै आसू बिद एकम, शरणो साहिबजी को रे । प्रभु को समरण कर नीको रे ।। ७ ।।
मैं तुम्हारी शरण में हूं ।