नहीं इसो दूसरो जगवीर । उपसर्ग सहिवा अडिग जिनवर, सुरगिरि जेम सधीर । चरम जिनेन्द्र चौबीसमा रे, अघ हणवा महावीर । विकट तप वर ध्यान धर प्रभु पाया भव जल तीर ।। १ ।।
प्रभो ! तुम इस युग के चौबीसवें तीर्थंकर हो, अन्तिम तीर्थंकर हो । तुम दोषों का नाश करने के लिए महान् वीर हो । तुमने विकट तप और प्रवर ध्यान कर भव-जल का पार पा लिया ।