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महावीर
चौबीसी स्तुति

तीर्थंकर महावीर प्रभु

लय : पोढ़ो प्रभु द्वारिका

1

नहीं इसो दूसरो जगवीर । उपसर्ग सहिवा अडिग जिनवर, सुरगिरि जेम सधीर । चरम जिनेन्द्र चौबीसमा रे, अघ हणवा महावीर । विकट तप वर ध्यान धर प्रभु पाया भव जल तीर ।। १ ।।

प्रभो ! तुम इस युग के चौबीसवें तीर्थंकर हो, अन्तिम तीर्थंकर हो । तुम दोषों का नाश करने के लिए महान् वीर हो । तुमने विकट तप और प्रवर ध्यान कर भव-जल का पार पा लिया ।

2

संगम दुख दिया आकरा पिण, सुप्रसन्न निजर दयाल । जग उद्धार हुवै मो थकी रे, ए डूबै इण काल ।। २ ।।

संगम देव ने भयंकर कष्ट दिये फिर भी दयासिन्धो ! तुम्हारी दृष्टि सुप्रसन्न थी । तुमने यही सोचा कि अद्भुत है यह बात—मुझसे जगत् का उद्धार हो रहा है और यह मुझे निमित्त बना डूब रहा है ।

3

लोक अनारज बहु किया रे, उपसर्ग विविध प्रकार । ध्यान सुधारस लीनता जिन, मन में हरष अपार ।। ३ ।।

आदिवासी लोगों ने तुम्हें नाना प्रकार के कष्ट दिये । तुम ध्यान सुधा के रस में लीन थे । इसलिए तुम्हारी प्रसन्नता कभी टूट नहीं पायी ।

4

इण पर कर्म खपाय नै प्रभु, पाया कवेल नाण । उपशम रसमय बागरी रे, अधिक अनूपम वाण ।। ४ ।।

इस प्रकार कर्मक्षय कर तुमने केवलज्ञान प्राप्‍त किया और उपशम रस से भरी हुई अनुपम वाणी का दोष किया ।

5

पुद्गल सुख अरि शिव तणा रे, नरक तणा दातार । छांड रमण किंपाक बेली, संवेग संजम धार ।। ५ ।।

पौद्गलिक सुख मोक्ष के बाधक हैं और नरक देने वाले हैं । किम्पाक लता के समान वासना को छोड़कर संवेग पूर्वक संयम को धारण किया ।

6

निंदा नै स्तुति समपणै रे, मान अनै अपमान । हरष शोग मोह परहर्यां रे, पामै पद निरवाण ।। ६ ।।

निन्दा-स्तुति और मान-अपमान में समभाव तथा हर्ष, शोक और मोह के परिहार द्वारा निर्वाण-पद प्राप्‍त होता है ।

7

इम बहुजन प्रभु तारिया रे, प्रणमूं चरम जिणंद । उगणीसै आसोज चौथ विद, हुओ अधिक आणंद ।। ७ ।।

इस उपदेशासे तुमने अनेक लोगों को संसार-समुह से तार दिया । हे अंतिम तीर्थंकर ! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं । तुम्हारी स्तुति से मुझे बहुत आनंद मिला ।