मल्लि जिनेश्वर नाम समर तरण शरण आयो । नील वर्ण मल्लि जिनेश्वर, ध्यान निर्मल ध्यायो । अल्प काल मांहि प्रभू, परम-ज्ञान पायो ।। १ ।।
तुम्हारा वर्ण नील है । तुमने निर्मल ध्यान किया और अल्पकाल में (एक प्रहर के बाद) परमज्ञान (केवलज्ञान) पा लिया ।
मल्लि जिनेश्वर नाम समर तरण शरण आयो । नील वर्ण मल्लि जिनेश्वर, ध्यान निर्मल ध्यायो । अल्प काल मांहि प्रभू, परम-ज्ञान पायो ।। १ ।।
तुम्हारा वर्ण नील है । तुमने निर्मल ध्यान किया और अल्पकाल में (एक प्रहर के बाद) परमज्ञान (केवलज्ञान) पा लिया ।
कल्प पुष्पमाल जेम, सुगंध तन सुहायो । सुर-वधू वर नयन-भ्रमर, अधिक ही लिपटायो ।। २ ।।
प्रभो ! तुम्हारे शरीर से कल्पवृक्ष की पुष्पमाला जैसी सुगंध फूट रही थी । देवांगनाओं के नयन रूप भ्रमर उसके प्रति आकर्षित हो झूम रहे थे ।
स्व पर चक्र विविध विघन, मिटत तो पसायो । सिंघनाद थकी गजेन्द्र, जेम दूर जायो ।। ३ ।।
प्रभो ! तुम्हारे प्रसाद से स्वचक्र-परचक्र के भय और विविध विघ्न वैसे ही दूर हो जाते हैं, जैसे सिंहनाद सुनकर गजेन्द्र ।
वाण विमल निमल सुधा-रस संवेग छायो । नर सुरासर तिरि समाज, सुणत ही हरषायो ।। ४ ।।
तुम्हारी वाणी विमल सुधारस और निर्मल संवेग रस से भावित है । उसे सुनते ही मनुष्य, देव, असुर और तिर्यंच सब हर्षित होते हैं ।
जगदयाल तूं हि कृपाल, जनक ज्यूं सुखदायो । वच्छल नाथ स्वाम साहिब, सुजस तिलक पायो ।। ५ ।।
प्रभो ! तुम जगत् के प्रति दयालु, कृपालु और माता-पिता के समान सुखदायक हो । तुमने वात्सल्य और सरंक्षण देकर सुयश-तिलक प्राप्त कर लिया ।
जपत जाप खपत पाप, तपत ही मिटायो । मल्लिदेव त्रिविध सेव, जग अछेरो पायो ।। ६ ।।
तुम्हारा जाप जपने से पाप-क्षय हो जाता है और संताप मिट जाता है । प्रभो ! तुमने त्रिविध (मानसिक, वाचिक और कायिक) उपासना द्वारा स्त्रीरूप में तीर्थंकर बनकर जगत् को आश्चर्य में डाल दिया ।
उगणीसै आसोज कृष्ण, तीज सुदिन आयो । कुम्भ-नन्द कर आनन्द, हरष थी मैं गायो ।। ७ ।।
मेरे लिए आज का दिन सुदिन है । हे कुम्भनन्द ! मैंने हर्ष-विभोर और आनंदित होकर तुम्हारा गुणगान किया ।