प्रभूजी ! आप प्रबल बड़ भागी । त्रिभुवन दीपक सागी रा ।। सुमित्रनन्दन श्री मुनिसुव्रत, जगतनाथ जिन जाणी । चारित्र ले केवल उपजायो, उपशम रस नीं वाणी रा ।। १ ।।
सुमित्र राजा के पुत्र मुनिसुव्रत प्रभु ! तुम जगत् के नाथ हो । तुमने चारित्र स्वीकार कर केवलज्ञान प्राप्त किया । तुम्हारी वाणी उपशम रसमय थी ।