1प्रभूजी ! आप प्रबल बड़ भागी । त्रिभुवन दीपक सागी रा ।। सुमित्रनन्दन श्री मुनिसुव्रत, जगतनाथ जिन जाणी । चारित्र ले केवल उपजायो, उपशम रस नीं वाणी रा ।। १ ।।
सुमित्र राजा के पुत्र मुनिसुव्रत प्रभु ! तुम जगत् के नाथ हो । तुमने चारित्र स्वीकार कर केवलज्ञान प्राप्त किया । तुम्हारी वाणी उपशम रसमय थी ।
2चौतीस अतिशय पैंतीस वाणी, निरखत सुर इन्द्राणी । संवेग रस नीं वाणी सांभल, हरष स्यूं आंख्यां भराणी रा ।। २ ।।
प्रभौ ! तुम्हारे चौंतीस अतिशय और पैंतीस वचनातिशयों को देव और इन्द्राणी भी देखते हैं । तुम्हारी संवेग रस से भरी हुई वाणी सुनकर उनकी आंखें हर्ष के आंसुओं से भर जाती हैं ।
3शब्द-रूप-रस-गंध-फरस, प्रतिकूल न हुवै तुम आगै । पंच दरशन थांस्यूं पग नहिं मांडै, (तिम) अशुभ शब्दादिक भागै रा ।। ३ ।।
प्रभो ! तुम्हारे सामने शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श प्रतिकूल नहीं होते । जैसे पांच दर्शनी (बौद्ध, नैयायिक, सांख्य, वैशेषिक और मीमांसक) तुम्हारे सामने पैर रोप ठहर नहीं पाते, वैसे ही अशुभ शब्द आदि तुमसे दूर भाग जाते हैं ।
4सुर कृत जल स्थल पुष्प पुंजवर, ते छांडी चित दीनो । तुझ निश्वास-सुगंध मुख-परिमल, मन-भ्रमर महा लीनो रा ।। ४ ।।
समवसरण में देवों द्वारा बरसाये गये जलज और स्थलज पुष्पसमूह को छोड़कर भक्तों ने अपना चित्त तुम्हारे निश्वास रूपी सौरभ पर और अपने मन-भ्रमर को तुम्हारे मुख-परिमल पर पूर्णरूप से समर्पित कर दिया ।
5पंचेन्द्री सुर नर तिरि तुम स्यूं, किम होवै दुखदायो । एकेन्द्री अनिल तजै प्रतिकूलपणुं, बाजै गमतो वायो रा ।। ५ ।।
पांच इन्द्रिय वाले देव, मनुष्य और तिर्यंच तुम्हारे लिए, दुःखद कैसे हो सकते हैं ? एक इन्द्रिय वाली वायु भी प्रतिकूल नहीं होती, वह भी सदा अनुकूल रहती है ।
6रागद्वेष दुर्दंत तै दमिया, चीत्या विषय विकारो । दीनदयाल आयों तुमसरणै, तूं गति-मति-दातारो रा ।। ६ ।।
प्रभो ! तुमने दुर्दान्त राग और द्वेष का दमन किया । विषय विकारों पर विजय प्राप्त की । हे दीनदपाल ! मैं तुम्हारी शरण में आया हूं । तुम गति और मति देने वाले हो ।
7उगणीसै आसोज तीज तिथि, श्री मुनिसुव्रत गाया । लाडनूं शहर मांहि रूड़ि रीते, आणंद अधिक पाया रा ।। ७ ।।
प्रभो ! मैंने तुम्हारा भलीभांति गुणगान किया, इससे मुझे अतिशय आनंद मिला ।