1प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे । मुझ प्यारा प्राण आधारा ।। नमिनाथ अनाथां रा नाथो रे, नित्य नमण करूं जोड़ी हाथो रे । कर्म काटण वीर विख्यातो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।। १ ।।
नमिनाथ प्रभो ! तुम अनाथों के नाथ हो । मैं बद्धांजलि हो तुम्हें नित्य प्रणाम करता हूं । तुम कर्म-बंधन को छिन्न करने के लिए सुप्रसिद्ध वीर हो ।
2प्रभु ध्यान सुधारस ध्याया रे, पद केवल जोड़ी पाया रे । गुण उत्तम-उत्तम आया, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।। २ ।।
तुमने अमृतरसमय ध्यान किया और केवल-युगल (केवलज्ञान और केवलदर्शन) प्राप्त कर लिया । तुम्हारे जीवन में उत्तम उत्तम गुण प्रकट हुए ।
3प्रभु बागरी वाण विशालो रे, खीर-समुद्र थी अधिक रसालो रे । जगतारक दीनदयालो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।। ३ ।।
जगतारक दीनदयाल ! तुमने विशाल वाणी में देशना दी । वह तुम्हारी वाणी क्षीर-समुद्र से भी अधक रसमय थी ।
4थाप्या तीरथ च्यार जिनिन्दो रे, मिथ्या-तम हरण मुनिन्दो रे । ज्यांनैं सेवत सुर-नर वृन्दो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।। ४ ।।
तुमने मिथ्यात्व रूपी अंधकार को दूर करने के लिए चार तीर्थ (साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका) स्थापित किये । देव और मनुष्य-समूह तुम्हारी उपासना करते हैं ।
5सुर अनुत्तर विमाण नां सेवै रे, प्रश्न पूछ्यां उत्तर जिन देवै रे । अवधिज्ञान करी जाण लेवै, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।। ५ ।।
अनुत्तर विमान के अहमिन्द्र देव तुम्हारी उपासना करते हैं । वे वहां बैठे-बैठे प्रश्न करते हैं, तुम उन्हें उत्तर देते हो । वे अवधिज्ञान द्वारा उसे जान लेते हैं ।
6तिहां बैठा ते तुम ध्यान ध्यावै रे, तुम योग-मुद्रा चित चावै रे । ते पिण आपरी भावना भावै, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।। ६ ।।
वे वहां बैठे-बैठे तुम्हारा ध्यान करते हैं । तुम्हारी योगमुद्रा को अन्त:करण से चाहते हैं । वे तुम्हारी भावना से भावित हो जाते हैं ।
7उगणीसै आसोज उदारो रे, कृष्ण चौथ गाया गुणधारो रे । हुवो आणंद हर्ष अपारो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे ।। ७ ।।
मैंने प्रभु के गुण गाये, इससे मुझे अपार आनन्द और हर्ष हुआ ।