1प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी । रिठनेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।। तूं तोरण स्यूं फिर्यो जिन-स्वाम, अद्भुत बात करी तैं अमाम । प्रभु नेम-स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।। १ ।।
तुम विवाह-तोरण के पास जा लौट आये । यह अद्भुत और अनुपम काम किया तुमने ।
2राजिमती छांडी जिनराय, शिव-सुन्दर स्यूं प्रीत लगाय । प्रभु नेम-स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।। २ ।।
तुमने शिव-सुन्दरी से प्रीति लगा कर राजीमती को छोड़ दिया । अद्भुत है तुम्हारी लीला ।
3केवल पाया ध्यान वर ध्याय, इन्द्र शची निरखै हरषाय । प्रभु नेम-स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।। ३ ।।
प्रभो ! तुमने श्रेष्ठ ध्यान कर केवलज्ञान पा लिया । इन्द्र और इन्द्राणी तुम्हें हर्षित होकर देख रहे हैं ।
4नेरिया पिण पामैं मन मोद, तुझ कल्याण सुर करत विनोद । प्रभु नेम-स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।। ४ ।।
प्रभो ! तुम्हारे कल्याणक—गर्भाधान, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान-प्राप्ति और परिनिर्वाण के समय देव तो आनंदित होते ही हैं, नैरयिक जीव भी प्रमुदितमना हो जाते हैं ।
5राग-रहित शिव सुख स्यूं प्रीत, कर्म हणै बलि द्वेष-रहीत । प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।। ५ ।।
मोक्ष के सुखों से तुम्हारी प्रीति है, फिर भी तुम राग-रहित हो । तुम कर्म का हनन करते हो, फिर भी तुम द्वेष-रहित हो ।
6इचरजकारी थांरो चरित्त, हूं प्रणमूं कर जोड़ी नित्त । प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।। ६ ।।
प्रभो ! तुम्हारा चरित्र आश्चर्यकारी है । मैं बद्धांजलि होकर तुम्हें प्रतिदिन प्रणाम करता हूं ।
7उगणीसै बिद कुमार, नेम जप्यां पायो सुखासार । प्रभु नेम-स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ।। ७ ।।
तुम्हारा जप करने से मुझे सारभूत सुख मिला ।