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पद्मप्रभ
चौबीसी स्तुति

तीर्थंकर पद्म प्रभु

लय : कुशलपुरी में प्रभु जनमिया

1

पदम प्रभू नित समरियै । निर्लेप पदम जिसा प्रभू, प्रभु पदम पिछाण । संयम लीधो तिण समै, पाया चोथो नाण ।। १ ।।

पद्म प्रभु ! तुम कमल की भांति निर्लिप्‍त थे । तुमने जिस क्षण साधुत्व स्वीकार किया, उसी क्षण तुम्हें मनःपर्यव ज्ञान प्राप्‍त हो गया ।

2

ध्यान शुकल प्रभु ध्याय नैं, पाया केवल सोय । दीनदयाल तणी दशा, कैणी नावै कोय ।। २ ।।

प्रभो ! तुमने शुक्लध्यान में लीन होकर कैवलज्ञान प्राप्‍त किया । उस समय तुम्हारी जो स्थिति बनी, वह अनिर्वचनीय है ।

3

सम दम उपशम रस भरी, प्रभु ! आपरी वाण । त्रिभुवन तिलक तू ही सही, तू ही जनक समान ।। ३ ।।

प्रभो ! तुम्हारी वाणी शम, दम और उपशम रस से आप्लावित है । तुम्हीं इस त्रिलोकी के तिलक और पिता के समान हो ।

4

तूं प्रभु कल्पतरू जिसो, तूं चिंतामणि जोय । समरण करतां आपरो, मन-वांछित होय ।। ४ ।।

प्रभो ! तुम कल्पवृक्ष और चिन्तामणि रत्‍न के समान हो । तुम्हारा सुमिरन करने से मनोवांछित काम सिद्ध हो जाता है ।

5

सुखदायक सहु जग भणी, तूं ही दीनदयाल । शरण आयो तुझ साहिबा ! तू ही परम कृपाल ।। ५ ।।

प्रभो ! तुम इस समूचे जगत् के लिए सुख-दायक हो, तुम्हीं दीनदयाल हो, तुम्हीं परम कृपालु हो, इसलिए मैं तुम्हारी शरण में आया हूं ।

6

गुण गातां मन गह-गहै, सुख संपति जाण । विघन मिटै समरण कियां, पामै परम कल्याण ।। ६ ।।

प्रभो ! तुम्हारे गुणों का संगान करने से मन उल्लसित होता है । और सुख-सम्पत्ति उपलब्ध हो जाती है । तुम्हारा सुमिरन करने से विघ्‍न दूर होते हैं और परम कल्याण की प्राप्‍ति होती है ।

7

उगणीसै नैं भाद्रवै, सुदि बारस देख । पदम प्रभू रट्या लाडनूं, हुओ हरष विशेष ।। ७ ।।

प्रभो ! तुम्हारी स्तुति की, उससे मुझे अपार हर्ष हुआ है ।