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पार्श्वनाथ
चौबीसी स्तुति

तीर्थंकर पार्श्‍वनाथ प्रभु

लय : पूज भीखणजी तुम्हारा दर्शन

1

पारस देव ! तुम्हारा दर्शन भाग भला सोई पावै हो । भाग भला सोई पावै, हूं वारि जाऊं, जीव मगन हो ज्यावै हो पारस देव ! लोह कंचन करै पारस काचो, ते कहो कर कुण लेवै हो । पारस तू प्रभु साचो पारस, आप समो कर देवै हो ।। १ ।।

लोहे को सोना बनाने वाला पारस नकली है । उसे कौन हाथ में लेगा ? पार्श्‍व प्रभो ! असली पारस तुम हो, जो लोहे को भी पारस बना देते हो ।

2

तुझ मुख-कमल पासै चमरावलि, चन्द्रकांतिवत सोहै हो । हंस-श्रेणि जाणै पंकज सेवै, देखत जन-मन मोहै हो ।। २ ।।

प्रभो ! तुम्हारे मुखकमल के पास ढुलाये जा रहे चामर चन्द्रमा की कांति जैसे सुशोभित हो रहे हैं । ऐसा लगता है मानों पंक्तिबद्ध हंस नीलकमल की उपासना कर रहे हैं । उस दृश्य को देखकर जन-जन के मन मुग्ध हो जाते हैं ।

3

फटिक-सिंहासण सिंह आकारे, बैस देशना देवै हो । वन-मृग आवै वाणी सुणवा, जाणक सिंह नै सेवै हो ।। ३ ।।

प्रभो ! तुम सिंह के आकार वाले, स्फटिक मणि से निर्मित सिंहासन पर बैठकर देशना देते हो । वन्यपशु तुम्हारी वाणी सुनने के लिए आ जाते हैं । ऐसा प्रतीत होता है मानो वे सिंह की उपासना में बैठे हों ।

4

चन्द्र समो तुझ मुख महाशीतल, नयन-चकोर लुभावै हो । इन्द्र नरेन्द्र सुरासुर रमणी, निरखत तृप्‍ति न पावै हो ।। ४ ।।

प्रभो ! तुम्हारा मुख चन्द्रमा के समान अतिशय शीतल है, उसे देख भक्तों के नयन-चकोर हर्षित हो रहे हैं । इन्द्र, नरेन्द्र, सुर और असुर की अंगनाएं उसे देखकर तृप्‍त ही नहीं होती ।

5

पाखंडी सरागी आप विरागी, आपस में इम गैरी हो । वैर भाव पाखंडी राखै, आप त्यांरा नहिं वैरी हो ।। ५ ।।

ये सांप्रदायिक लोग राग से भरे हुए हैं । तुम वीतराग हो । यह स्पष्ट भिन्नता है । वे तुमसे वैर-भाव रखते हैं, तुम्हारे मन में उनके प्रति कोई वैर-भाव नहीं है ।

6

जिम सूरज खद्योत ऊपरै, वैर-भाव नहिं आगै हो । इण विध प्रभु पिण पाखंडियां नैं, खद्योत सरीखा जाणै हो ।। ६ ।।

जैसे सूरज जुगनू पर वैर-भाव नहीं लाता, वैसे ही तुम सांप्रदायिक लोगों को जुगनू जैसा मान उन पर वैर-भाव नहीं लाते ।

7

परमदयाल कृपाल पारस प्रभु, संवत उगणीसै गाया हो । कृष्ण पक्ष तिथि चौथ लाडनूं, आणंद अधिको पाया हो ।। ७ ।।

मैंने परम दयालु और कृपालु पारस प्रभु की स्तवना की । मुझे अतिशय आनंद मिला ।