संभव साहिब समरियै । संभव साहिब समरियै, ध्यायो है जिन निर्मल ध्यान कै । एक पुद्गल दृष्टि थाप नै, कीधो है मन मेर समान कै ।। १ ।।
प्रभो ! तुमने निर्मल ध्यान किया, किसी एक वस्तु पर दृष्टि को टिका मन को मेरु के समान अडोल बना लिया ।
संभव साहिब समरियै । संभव साहिब समरियै, ध्यायो है जिन निर्मल ध्यान कै । एक पुद्गल दृष्टि थाप नै, कीधो है मन मेर समान कै ।। १ ।।
प्रभो ! तुमने निर्मल ध्यान किया, किसी एक वस्तु पर दृष्टि को टिका मन को मेरु के समान अडोल बना लिया ।
तन-चंचलता मेट नै, हुआ है जग थी उदासीन कै । धर्म शुकल थिर-चित्त धरै, उपशम-रस में होय रह्या लीन कै ।। २ ।।
प्रभो ! तुम शारीरिक चपलता को छोड़कर जगत् से उदासीन हो गये । स्थिर चित्त से धर्म और शुक्ल ध्यान को धारण कर तुम उपशम रस में लीन बन गये ।
सुख इन्द्रादिक नां सहु, जाण्या है प्रभु अनित्य असार कै । भोग भयंकर कटुक फल, देख्या है दुर्गति दातार कै ।। ३ ।।
प्रभो ! तुमने इन्द्र आदि के सुखों को अनित्य और असार समझा । तुमने देखा——ये भौग भयंकर, परिणाम कटु और दुर्गति-दायक हैं ।
सुधा संवेग-रसे भर्या, पेख्या है पुद्गल मोह पास कै । अरुचि अनादर आण नैं, आतम ध्यानें करता विलास कै ।। ४ ।।
प्रभो ! संवेग रूपी सुधारस से आपूरित होकर तुमने देखा—यह पौद्गलिक सुख मोह-पाश है । उसके प्रति अरुचि और अनादार के भाव लाकर तुम आत्मध्यान में रम गये ।
संग छांड मन वश करी, इन्द्रिय-दमन करी दुर्दन्त कै । विविध तपै करी स्वामजी, घाति करम न कीधो अंत कै ।। ५ ।।
प्रभो ! तुमने संग (आसक्ति) छोड़ मन को वश में किया, दुर्दम इन्द्रियों का दमन किया, नाना प्रकार की तपस्या कर घाती कर्मों को क्षीण कर दिया ।
हूँ तुझ शरणे आवियो, कर्म-विदारण तूंप्रभु ! वीर कै । मैं तन मन वच बस किया, दुःकर करणि करण महाधीर कै ।। ६ ।।
प्रभो ! मैं तुम्हारी शरण में आ चुका हूँ । तुम कर्मों का विदारण करने में वीर हो । तुमने शरीर, मन और वचन को वश में कर लिया । तुम दुष्कर क्रिया करने में महान् धीर हो ।
संवत उगणीसै भाद्रवै, सुदि इग्यारस आण विनोद कै । संभव साहिब समरिया,
संभव प्रभो ! मैंने उल्लसित होकर तुम्हारा सुमिरन किया । इससे मेरा मन अधिक प्रमुदित हुआ है ।