बलिहारी हो शांति जिणंद की । शांति करण प्रभु शांतिनाथजी, शिवदायक सुखकंद की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।। १ ।।
शांति प्रभु ! तुम शांतिकारक, शिवदायक और सुख के मूल हो ।
बलिहारी हो शांति जिणंद की । शांति करण प्रभु शांतिनाथजी, शिवदायक सुखकंद की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।। १ ।।
शांति प्रभु ! तुम शांतिकारक, शिवदायक और सुख के मूल हो ।
अमृत-वाण सुधा-सी अनुपम, मेटण मिथ्या मंद की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।। २ ।।
तुम्हारी अमृत जैसी मधुर अनुपमेय अमरवाणी मिथ्यात्व जनित मंदता को मिटाने वाली है ।
काम भोग राग द्वेष कटुक फल, विष-बेली मोह-धंध की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।। ३ ।।
काम-भोग और राग-द्वेष कड़वे फलवाले है, विष लता के समान हैं और मोह-मूर्च्छा के परिणाम हैं ।
राखसणी रमणी वैतरणी, पुतली अशुचि दुर्गन्ध की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।। ४ ।।
वासना राक्षसी और वैतरणी नदी है । मनुष्य की देह अशुचि और दुर्गन्ध की पुतली है ।
विविध उपदेश देई जन तार्या, हूं वारि जाऊं विश्वनंद की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।। ५ ।।
तुमने विविध उपदेश देकर लोगों को तृष्णा के पार पहुंचाया । हे विश्वपुत्र ! तुम्हारे चरणों में मैं अपने आपको उपहृत करता हूं ।
परम दयाल गोवाल कृपानिधि, तुम जप माला आनंद की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।। ६ ।।
तुम परम दयालु, गोपाल और कृपानिधि हो, तुम्हारी जपमाला आनंद देने वाली है ।
संवत उगणीसै आसू बिद एकम, शांति-लता सुखकंद की । बलिहारी हो शांति जिणंद की ।। ७ ।।
शांति-लता सुख के मूल को विकसित करे ।