मुख्य सामग्री पर जाएँ
श्रेयांसनाथ
चौबीसी स्तुति

तीर्थंकर श्रेयांस प्रभु

लय : पुत्र वसुदेव रा गजसुखमाल

1

श्रेयांस जिनेश्‍वरू ! प्रणमूं नित बेकर जोड़ रे । मोक्ष मार्ग श्रेय शोभता, धार्या स्वाम श्रेयांस उदार रे । जे जे श्रेय वस्तु संसार में, ते ते आप करी अंगीकार रे । ते ते आप करी अंगीकार, श्रेयांस जिनेश्‍वरू ।..... ।। १ ।।

श्रेयांस प्रभो ! मोक्ष मार्ग के लिए जो श्रेय मा, उसे तुमने धारण किया । इस संसार में जो-जो श्रेय वस्तुएं थीं, उन सबको तुमने अंगीकार कर लिया ।

2

समिति गुप्‍ति दुर्धर घणां, धर्म शुकल ध्यान उदार रे । ए श्रेय वस्तु शिवदायनी, आप आदरी हरष अपार रे ।। २ ।।

अत्यन्त दुर्धर समितियां, गुप्‍तियां एवं उदार धर्मध्यान और शुक्लध्यान—ये मोक्षदायक (शिवदायक) श्रेय तत्त्व हैं । तुमने अपार प्रसन्नता के साथ इनका वरण किया ।

3

तन चंचलता मेट नैं, पद्मासन आप विराज रे । उत्कृष्ट ध्यान तणो कियो, आलंबन श्री जिनराज रे ।। ३ ।।

प्रभो ! तुमने शरीरिक चंचलता छोड़ पद्मासन की मुद्रा में विराजमान उत्कृष्ट ध्यान का आलंबन लिया ।

4

इंद्रिय विषय विकार थी, नरकादिक रुलियो जीव रे । किंपाक फल नीं ओपमा, रहिये दूर थी दूर सदीव रे ।। ४ ।।

इन्द्रिय-विषय-जनित विकार के कारण जीव नरक आदि गतियों में भटकता है । तुमने हैं किम्पाक फल से उपमित किया है, इसलिए इससे सदा दूर रहना श्रेयस्कर है ।

5

संजम तप जप शील ए, शिव-सान महा सुखकार रे । अनित्य अशरण अनंव ए, ध्यायो निर्मल ध्यान उदार रे ।। ५ ।।

संयम, तप, जप और शील मोक्ष कै साधन और महान् सुख देने वाले हैं । तुमने अनित्य, अशरण और अनन्त की अनुप्रेक्षा कर निर्मल और उदार ध्यान किया ।

6

त्रीयादिक न संग ते, आलंबन दुख दातार रे । अशुद्ध आलंबन छांड नैं, धार्यो ध्यान आलंबन सार रे ।। ६ ।।

स्‍त्री आदि का संग दुःखदायक आलम्बन है । तुमने इस अशुद्ध आलम्बन को छोड़कर सारभूत ध्यान- तत्त्व का आलम्बन किया ।

7

शरण आयो तुझ साहिबा, करूं बार-बार नमस्कार रे । उगणीसै पूनम भाद्रवी, मुझ वरत्या जै जै कार रे ।। ७ ।।

प्रभो ! मैं तुम्हारा शरणागत हूं और तुम्हें पुनः पुनः नमस्कार करता हूं । इससे मेरे जीवन में जयजयकार हुआ है ।