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सुमतिनाथ
चौबीसी स्तुति

तीर्थंकर सुमति प्रभु

लय : मूरख जीवड़ा रे गाफल मत रहै

1

सुमति जिनेश्‍वर साहिब शोभता । सुमति जिनेश्‍वर साहिब शोभता, सुमति करण संसार । सुमति जप्यां थी सुमति बधै घणी, सुमति सुमति-दातार ।। १ ।।

सुमति का जाप करने से सुमति की अतिशय वृद्धि होती है । सुमति ! तुम सुमति के दाता हो ।

2

ध्यान सुधारस निरमल ध्याय नैं, पाम्या केवल नाण । बाण सरस वर जन बहु तारिया, तिमिर हरण जगभाण ।। २ ।।

प्रभो । तुमने अमृत-रसमय निर्मल ध्यान के द्वारा केवलज्ञान प्राप्‍त किया । अपनी सरस और श्रेष्ठ वाणी के द्वारा अनेक लोगों को पार पहुंचाया । प्रभो ! तुम अन्धकार को दूर करने के लिए जगत् में सूर्य हो ।

3

फटिक-सिंहासण जिनजी फाबता, तरु अशोक उदार । छत्र चमर भामंडल भलकतो, सुर-दुन्दुभि झिणकार ।। ३ ।।

विशाल अशोक वृक्ष के नीचे स्फटिक सिंहासन पर तुम सुशोभित रहे हो । तुम्हारे सिर पर छत्र है, दोन पार्श्‍वों में चामर झूल रहे हैं, सिर के पीछे देदीप्यमान आभा मंडल है, देश-दुन्दुभिबर्नज रही है ।

4

पुष्प-वृष्‍टि दिव्य-ध्वनि दीपती, साहिब जग सिणगार । अनंत ज्ञान दर्शन बलि चरण ही, द्वादश गुण श्रीकार ।। ४ ।।

प्रभो ! तुम्हारे समवसरण में पुष्पवृष्टि और मन को भाने वाली दिव्य ध्वनि होती है । तुम जग के श्रृंगार हो । तुम अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त बल, अनन्त चारित्र श्रेष्ठ बारह गुणों के धारक हो ।

5

वाण अमी सम उपशम-रस भरी, दुर्गति-मूल कषाय । शिल-सुख नां अरि शब्दादिक कह्या, जग-तारक जिनराय ।। ५ ।।

प्रभो ! तुम्हारी अमृतोपम वाणी उपशम रस से भरी हुई है । तुमने शब्द, रूप आदि विषयों को मोक्ष-सुख का शत्रु और कषाय को दुर्गति का मूल बताया । हे जिनेश्‍वर ! तुम जगत् को तारने वाले हो ।

6

अंतरयामी ! शरणै आपरै, हूं आयो अवधार । जाप तुमारो निश-दिन संभरूं, शरणागत सुखकार ।। ६ ।।

अन्तर्यामिन् ! मैं अवधारणा पूर्वक तुम्हारी शरण में आया हूं । तुम शरणागत को शांति देने वाले हो, यह समझकर मैं दिन-रात तुम्हारा जाप कर रहा हूं ।

7

संवत उगणीसै सुदि पख भाद्रवै, बारस मंगलवार । सुमति जिनेश्‍वर तन मन स्यूं रट्या, आनंद उपनो अपार ।। ७ ।।

मैंने तन-मन से अर्हत् सुमति के नाम की रटन लगाई, इससे मुझे बहुत आनंद मिला ।