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सुपार्श्वनाथ
चौबीसी स्तुति

तीर्थंकर सुपार्श्‍व प्रभु

लय : कृपण दीन अनाथ ए

1

भजियै नित्य स्वामी सुपास ए । सुपास सातमां जिणंद ए, ज्यांनै सेवै सुर नर वृंद ए । सेवक पूरण आश ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। १ ।।

सुपार्श्‍व प्रभु ! तुम सातवें तीर्थंकर हो । देव और मनुष्य तुम्हारी उपासना कर रहे हैं । तुम उपासकों की आशा पूरी करने वाले हो ।

2

ज न प्रतिबोधण काम ए, प्रभु बागरै वाण अमाम ए । संसार स्यू हुवै उदास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। २ ।।

जनता को प्रतिबोध देने के लिए तुमने अनुपम देशना दी । उसे सुनने वाले संसार से उदासीन हो गये ।

3

पामैं कामभोग थी उद्वेग ए, बलि उपजै परम संवेग ए । एहवा तुम बच सरस विलास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। ३ ।।

प्रभो ! तुम्हारी वाणी का विलास इतना सरस है कि उसे सुनने वाले काम-भोग से उद्विग्‍न हो जाते हैं और उनके मन में परम संवेग उत्पन्न हो जाता है ।

4

घणी मीठी चक्री न खीर ए, बलि खीर-समुद्र नो नीर ए । एह थी तुम वच अधिक विमास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। ४ ।।

चक्रवर्ती की खीर और क्षीर-समुद्र का नीर ये दोनों बहुत मधुर होते हैं, तुम्हारी वाणी उनसे भी अधिक मधुर थी ।

5

सांभल नै जनव्रन्द ए, रोम-रोम में पामै आनंद ए । ज्यांरी मिटै नरकादिक त्रास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। ५ ।।

तुम्हारी वाणी सुनकर जन-समूह रोम-रोम में आनन्द का अनुभव कर रहा है । उस वाणी को सुनने वालों के नरक आदि का संत्रास दूर हो जाता है ।

6

तुं प्रभु ! दीन-दयाल ए, तू ही अशरण-शरण निहाल ए । हूं छूं तुम्हारो दास ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। ६ ।।

प्रभो ! तुम दीनदयाल हो और अशरण के शरण हो । मैं तुम्हारे चरण का दास हूं ।

7

संवत उगणीसै सोय ए, भाद्रवा सुदि तेरस जोय ए । पहुंची मन नीं आश ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।। ७ ।।

मेरे मन की आशा पूरी हो गयी ।