प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ! द्वादशमा जिनवर भजियै, राग द्वैष मच्छर माया तजियै । प्रभु लाल वरण तन छिब जाणी, प्रभु वासुपूज्य भचलै प्राणी ।। १ ।।
प्रभो ! तुम बारहवें तीर्थंकर हो । तुम्हारे शरीर की छवि रक्तिम आभा लिये हुए है । हमें राग, द्वेष मात्सर्य और माया को छोड़कर तुम्हारा भजन करना चाहिए ।