1प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ! द्वादशमा जिनवर भजियै, राग द्वैष मच्छर माया तजियै । प्रभु लाल वरण तन छिब जाणी, प्रभु वासुपूज्य भचलै प्राणी ।। १ ।।
प्रभो ! तुम बारहवें तीर्थंकर हो । तुम्हारे शरीर की छवि रक्तिम आभा लिये हुए है । हमें राग, द्वेष मात्सर्य और माया को छोड़कर तुम्हारा भजन करना चाहिए ।
2वनिता जाणी वेतरणी, शिव-सुंदर वरवा हूंस घणी । काम-भोग तज्या किम्पाकाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।। २ ।।
तुमने वासना को वैतरणी नदी समझा पर मुक्ति-स्त्री का वरण करने की चीख अभीप्सा की । तुमने काम-भोगों को किम्पाक समझकर छोड़ दिया ।
3अंजन - मंजन स्यूं अलगा, बलि पुष्प विलेपन नई विलगा । कर्म काट्या ध्यान-मुद्रा ठाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।। ३ ।।
तुमने आंखों में अंजन नहीं आंजा, स्नान नहीं किया और शरीर पर पुष्प विलेपन आदि का स्पर्श भी नहीं किया । ध्यान-मुद्रा में स्थित हो कर्म के बंधन काट डाले ।
4इन्द्र थकी अधिका औपै, करुणागक कदेय नहीं कोपै । वर साकर दूध जिसी वाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।। ४ ।।
वासुपूज्य प्रभो ! तुम्हारी इन्द्र से भी अधिक शोभा है । हे करुणाकर ! तुम कभी कुपित नहीं होते । इसलिए तुम्हारी वाणी में मिश्री-मिश्रित दूध जैसी मिठास है ।
5स्त्री स्नेह पासा दुर्दन्ता, कह्या नरक निगोद तणां पंथा । इह भव र भव दुखदाणी, प्रभु मासुपूज्य भजलै प्राणी ।। ५ ।।
स्त्री के प्रति होने वाले दुर्दम स्नेहपाश को तुमने नरक और निगोद का पथ बतलाया । वह इस भव और परभव दोनों में दुःख देने वाला है ।
6गज कुंभ दलै मृगराज हणी, पिण दौहिली निज आतम दमणी । इम सुण बहु जीव चेत्या जाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।। ६ ।।
गम-कुम्भ का दलन करने वाले तथा सिंह को मारने वाले योद्धा के लिए भी अपनी आत्मा को वश में करना कठिन है । तुम्हारी इस वाणी को सुनकर अनेक प्राणी जाग उठे ।
7भाद्रवी पूनम उगणीसो, कर जोड़ नमूं वासुपूज्य ईसो । प्रभु गातां रोम-राय हुलसाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी ।। ७ ।।
मैं करबद्ध होकर प्रभु वासुपूज्य को प्रणाम करता हूं । प्रभु के गुणों का संगान करने से मै रोम-रोम उल्लसित हो रहे हैं ।