1साहिब ! शरण तिहारै हो, शरण तिहारै, शरण तिहारै, शरण तिहारै हो । विमल प्रभु ! सेवक नीं अरदास, आयो शरण तिहारै हो । विमल करण प्रभु विमलनाथजी, विमल आप वर रीत । विमल ध्यान धरतां हुवै निर्मल, उन मन लागी प्रीत ।। १ ।।
विमल बनाने वाले विमल प्रभो ! तुम सचमुच ! विमल हो । विमल का ध्यान करने वाला निर्मल बन जाता है । तुम्हारे प्रति मेरा शरीर और मन दोनों प्रीति से सराबोर हो गये ।
2विमल ध्यान प्रभु आप ध्याया, तिण सूं हुवा विमल जगदीश । विमल ध्यान बलि में कोई ध्यासी, होसी विमल सरीस ।। २ ।।
प्रभो ! तुमने विमल ध्यान किया, इसलिए हे जगदीश ! तुम विमल बन गये । जो कोई तुम्हारा (विमल) ध्यान करेगा, वह तुम्हारे (विमल) जैसा हो जायेगा ।
3विमल गृहवासे द्रव्य जिनेंद्र था, दीख्या लीधां भावे साथ । केवल उपनां भवे जिनेश्वर, भावे विमल आराध ।। ३ ।।
प्रभो ! गृहवास में तुम द्रव्य-जिन थे, दीक्षा स्वीकार कर तुम भाव-मुनि बने और केवलज्ञान उत्पन्न होने पर भाव- जिन बन गये । हम भावविमल की आराधना करें ।
4नाम स्थापना द्रव्य विमल थी, कारज न सरै कोय । भाव विमल थी कारज सुधरै, भाव जप्यां शिव होय ।। ४ ।।
नाम, स्थापना और द्रव्य विमल (गुण शून्य) से कार्य नहीं सधता । भाव विमल (गुणयुक्त) के जप से कार्य सिद्ध होता है और शिवपद उपलब्ध होता है ।
5गुण गिरवो गंभीर धीर तूं, तूं मेटण चम-त्रास । मैं तुम वयण आगम शिर धार्या, तूं मुझ पूरण आश ।। ५ ।।
प्रभो ! तुम गुणों से गुरु, गंभीर और धीर हो । यम का संत्रास मिटाने वाले हो । मैंने तुम्हारे आगम-रूप वचनों को शिरोधार्य किया । तुम्हीं मेरी आशा पूरी करने वाले हो ।
6तूं ही कृपाल दयाल साहिब ! शिव-दायक तूं जगनाथ । निश्चल ध्यान धरै तुझ ओलख, ते मिलै तुझ संघात ।। ६ ।।
प्रभो ! तुम दयालु, कृपालु, शिवदायक और जगत् के नाथ हो । जो तुम्हें पहचान कर स्थिर चित्त से तुम्हारा ध्यान करते हैं, वे तुम्हारे पास पहुंच जाते हैं ।
7अंतरजामी आप उजागर, मैं तुम शरणो लीध । संवत उगणीसै भाद्रवी पूनम, बंछित कार सीध ।। ७ ।।
अन्तर्यामी ! तुम प्रकाशशील हो, मैं तुम्हारी शरण में आया हूं । मेरे वांछित कार्य सिद्ध हो गये हैं ।